कुरान - 2:174 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

174
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡتُمُونَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَيَشۡتَرُونَ بِهِۦ ثَمَنٗا قَلِيلًا أُوْلَـٰٓئِكَ مَا يَأۡكُلُونَ فِي بُطُونِهِمۡ إِلَّا ٱلنَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ ٱللَّهُ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمۡ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ

Transliteration: (Innal lazeena yaktumoona maaa anzalal laahu minal kitaabi wa yashtaroona bihee samanan qaleelan ulaaa'ika maa yaakuloona fee butoonihim illan Naara wa laa yukallimu humul laahu Yawmal Qiyaamati wa laa yuzakkeehim wa lahum 'azaabun aleem)

"174. बेशक, जो लोग छुपाते हैं [370] उस चीज़ को जो अल्लाह ने किताब में नाज़िल की, और उसे थोड़े से दाम में बेच देते हैं, वे अपनी पेटों में कुछ नहीं भरते मगर आग [372]। और क़यामत के दिन अल्लाह उनसे बात नहीं करेगा, और न उन्हें पाक करेगा, और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है [373]।" [370][372][373] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 174 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[370]

अल्लाह की किताब को छुपाना

  • इस आयत में उन लोगों की निंदा की जा रही है जो अल्लाह की नाज़िल की हुई आयतों को छुपाते हैं या बदलते हैं।
  • यह छुपाना कई तरीकों से हो सकता है:
    • असल आयतों को लोगों से छिपाना,
    • उनका सही मतलब न बताना,
    • या निजी फायदा उठाने के लिए उसका गलत मतलब पेश करना।
  • ऐतिहासिक सन्दर्भ: मदीना के यहूद (Yahud) जानते थे कि आख़िरी नबी ﷺ का ज़िक्र तौरात में है, लेकिन जब नबी ﷺ बनी इस्माईल में पैदा हुए और उनके असर व दौलत का डर पैदा हुआ, तो उन्होंने यह सच्चाई छिपा दी।

[372]

हक़ को छुपाने का अंजाम

  • जो लोग अल्लाह की हिदायत को छुपाते हैं, उनके लिए क़ुरआन कहता है कि वे अपने पेटों में "आग" भरते हैं — यानी उनका अंजाम जहन्नम की आग है।
  • हराम खाना: हराम चीज़ों को खाना भी इसी आग से जोड़ा गया है।
    • या तो वो हराम खाना खुद जहन्नम की आग बन जाएगा,
    • या उस हराम आमदनी की वजह से इंसान जहन्नम में जाएगा।

[373]

अल्लाह की नाराज़गी और सज़ा

  • क़यामत के दिन अल्लाह इन लोगों से बात नहीं करेगा, और न उन्हें पाक करेगा — यह बहुत बड़ी सज़ा और अल्लाह की नाराज़गी की निशानी है।
  • दर्दनाक अज़ाब: ऐसे लोगों के लिए दोज़ख़ की बहुत सख़्त सज़ा है, और कोई सिफ़ारिश (intercession) या रहमत नहीं मिलेगी।
  • ईमानवालों का मुक़ाबला: इसके उलट, जो लोग सच्चाई को कुबूल करते हैं और हक़ पर रहते हैं, अल्लाह उनसे बात करेगा, उन्हें माफ़ करेगा, और दोज़ख़ से बचाएगा।

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