Transliteration: (Wa qaatiloo fee sabeelillaahil lazeena yuqaatiloonakum wa laa ta'tadooo; innal laaha laa yuhibbul mu'tadeen)
जंग सिर्फ़ अपने दिफ़ा (self-defense) में:
इस आयत में अल्लाह ने हुक्म दिया है कि:
📌 इस्लाम में जंग की इजाज़त सिर्फ़ उस वक़्त है जब मजबूरी हो, जैसे खुद की हिफाज़त या मज़लूमों की मदद।
जंग के अदब (ethics):
👉 यह इस्लाम की अख़लाक़ी (नैतिक) हदों को बयान करता है।
हद से बढ़ना — हराम और नापसंद:
इस आयत का दूसरा हिस्सा साफ़ कहता है कि:
✅ इस्लाम कहता है कि पहले अमन की कोशिश होनी चाहिए, फिर भी अगर जंग लाज़मी हो तो सिर्फ़ ज़रूरी हद तक।
📌 "अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता" — ये बहुत बड़ी वार्निंग है कि इस्लाम में अन्याय, बेक़सूरों का ख़ून और जुल्म हर हाल में मना है।
इस आयत में अल्लाह ने दिफ़ा की जंग (self-defense) को जायज़ किया है, मगर साथ ही जंग के उसूल और इंसाफ़ की हदें भी तय कर दीं। इस्लाम बेगुनाहों को नुक़सान पहुंचाने, समझौतों को तोड़ने, और जुल्म करने वालों को अल्लाह की नाराज़गी का हक़दार बताता है।
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