Transliteration: (Fa-iza qadaitum manaa sikakum fazkurul laaha kazikrikum aabaaa'akum aw ashadda zikraa; faminannaasi mai yaqoolu Rabbanaaa aatinaa fiddunyaa wa maa lahoo fil Aakhirati min khalaaq)
✅ [470] हज के बाद अल्लाह को याद करना
अल्लाह का ज़ोर से जिक्र करना: यह आयत हज के रिवाज पूरे करने के बाद अल्लाह का ज़ोर से जिक्र करने को प्रोत्साहित करती है। यह प्रथा प्राचीन अरब मूर्तिपूजकों की परंपरा से ली गई है, जो अपने पूर्वजों के नाम जोर-जोर से सार्वजनिक रूप से बुलाते थे। उसी तरह, अल्लाह का नाम सम्मान के साथ और ज़ोर से लेना चाहिए, जिससे सार्वजनिक इबादत का महत्व और अल्लाह की याद का सामूहिक रूप से पालन स्पष्ट होता है।
ज़्यादा याद करना: मुसलमानों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे अपने पूर्वजों की तुलना में अल्लाह को ज़्यादा गहराई और लगन से याद करें। यह दिखाता है कि अल्लाह की याद दिलों में सबसे ऊपर होनी चाहिए।
✅ [471] सांसारिक लाभ की इच्छा
केवल दुनियावी फायदे माँगना: आयत बताती है कि कुछ लोग अल्लाह से केवल इस दुनिया के फायदे माँगते हैं, कहते हैं: "हे हमारे रब! हमें इस दुनिया में (अपने इनाम) दे दे।" यह दृष्टिकोण नाकाफी माना गया है क्योंकि यह केवल सांसारिक लाभ पर केंद्रित है, न कि आध्यात्मिक उन्नति या सदाबहार इनाम की इच्छा पर।
असंतुलित इबादत: आयत सलाह देती है कि हर दुआ और इबादत में मुसलमानों को अल्लाह की खुशी और मंज़ूरी माँगनी चाहिए, न कि सिर्फ़ दुनियावी चीज़ें। सच्ची इबादत वह है जो दुनिया और आख़िरत दोनों में अल्लाह की रज़ा को हासिल करे।
आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं: आयत चेतावनी देती है कि जो केवल सांसारिक लाभ की चाह रखते हैं और आख़िरत की परवाह नहीं करते, उनके लिए आने वाले जीवन की कोई नेमत नहीं होगी। यह उनके इमान की कमी और अस्थायी इच्छाओं पर ध्यान केंद्रित करने का परिणाम है।
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