कुरान - 2:232 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

232
وَإِذَا طَلَّقۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغۡنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعۡضُلُوهُنَّ أَن يَنكِحۡنَ أَزۡوَٰجَهُنَّ إِذَا تَرَٰضَوۡاْ بَيۡنَهُم بِٱلۡمَعۡرُوفِۗ ذَٰلِكَ يُوعَظُ بِهِۦ مَن كَانَ مِنكُمۡ يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۗ ذَٰلِكُمۡ أَزۡكَىٰ لَكُمۡ وَأَطۡهَرُۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ وَأَنتُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa izaa tallaqtumun nisaaa'a fabalaghna ajalahunna falaa ta'duloo hunna ai yankihna azwaaja hunna izaa taraadaw bainahum bilma' roof; zaalika yoo'azu bihee man kaana minkum yu'minu billaahi wal yawmil aakhir; zaalikum azkaa lakum wa at-har; wallaahu ya'lamu wa antum laa ta'lamoon)

232. और जब तुम महिलाओं को तलाक़ दे दो और उनकी इद्दत पूरी हो जाए, तो उन्हें अपने पूर्व पति से फिर से विवाह करने से न रोकें यदि वे आपस में सही तरीके से सहमत हों [560]। यह आदेश उन लोगों के लिए है जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर विश्वास करते हैं। यह तुम्हारे लिए अधिक पवित्र और शुद्ध है [562]। और अल्लाह जानता है, और तुम नहीं जानते [563]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 232 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[560] महिला का अपने पूर्व पति से विवाह करने का अधिकार

  • इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि एक महिला को अपने पूर्व पति से फिर से विवाह करने का अधिकार है, जब उसकी इद्दत समाप्त हो जाए।
  • यदि दोनों पति-पत्नी सहमत हों और इसमें कोई इस्लामी नियम नहीं टूट रहा हो, तो कोई भी बाहरी हस्तक्षेप उन्हें एक दूसरे से फिर से विवाह करने से रोकने का अधिकार नहीं रखता।
  • इसका मतलब यह है कि पत्नी को इस अधिकार के साथ, अपने पूर्व पति से विवाह करने की स्वीकृति है, जब तक दोनों का सहमति और इच्छा इस प्रक्रिया में शामिल है।

[561] वैध विवाह के लिए शर्तें

  • "सही तरीके से सहमति" का अर्थ है कि विवाह में कोई भी गैर-इस्लामी या निषिद्ध चीज़ें शामिल नहीं होनी चाहिए। जैसे कि:
    • दहेज (मेहर) इस्लामी तरीके से तय किया जाना चाहिए।
    • यदि कोई चीज़ जो इस्लाम में निषिद्ध है, जैसे शराब या सुअर का मांस, उसे दहेज के रूप में तय किया जाए, तो वह विवाह वैध नहीं होगा। ऐसे मामलों में कस्टमरी दहेज (Mehr-e-Mithl) लागू किया जाएगा।

[562] महिला के चुनाव को रोकने से नुकसान

  • इस आयत से यह सिखाया गया है कि एक महिला को अपने पसंदीदा जीवन साथी से विवाह करने का अधिकार छीनना, सामाजिक और व्यक्तिगत समस्याओं का कारण बन सकता है।
  • माता-पिता को अपने बच्चों के चुनावों का सम्मान करना चाहिए, जब तक वे इस्लामिक रूप से सही हों।
  • इस्लामी क़ानून, मुसलमानों के लिए ही लागू होते हैं, और यह नियम केवल उन्हीं पर लागू होते हैं जो अल्लाह और आख़िरत पर विश्वास करते हैं।

[563] विलंब और आस्थिक दृष्टिकोण

  • यह आयत विशेष रूप से हज़रत मुक़िल बिन यासार (RA) के बारे में उतरी थी, जिन्होंने अपनी बहन को अपने पूर्व पति, आसिम बिन आदि (RA), से फिर से विवाह करने की अनुमति नहीं दी, जबकि दोनों पुनः एक-दूसरे से विवाह करने की इच्छा रखते थे।
  • अल्लाह ने इस मामले में आवाज उठाई और बताया कि इस प्रकार का हस्तक्षेप गलत और निषिद्ध है।
  • अंतिम संदेश: अल्लाह को सब कुछ बेहतर ज्ञात है, और जो कुछ हमें कठिन या समझ में न आए, वह वास्तव में हमारे भले के लिए हो सकता है।

सारांश:

इस आयत में यह बताया गया है कि जब एक महिला ने अपनी इद्दत पूरी कर ली हो, तो वह अपने पूर्व पति से पुनः विवाह करने का अधिकार रखती है, यदि दोनों आपस में सहमत हों और विवाह इस्लामी तरीके से किया जाए। किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या अनावश्यक रोक-टोक को इस्लाम में गलत माना गया है, क्योंकि यह महिलाओं के स्वतंत्र निर्णय और अधिकारों के उल्लंघन के बराबर है। आयत अंत में यह याद दिलाती है कि अल्लाह का ज्ञान असीम है, और जो हमें कठिन या अस्पष्ट लगे, वह उसकी अद्भुत योजना का हिस्सा हो सकता है।

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