कुरान - 2:260 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

260
وَإِذۡ قَالَ إِبۡرَٰهِـۧمُ رَبِّ أَرِنِي كَيۡفَ تُحۡيِ ٱلۡمَوۡتَىٰۖ قَالَ أَوَلَمۡ تُؤۡمِنۖ قَالَ بَلَىٰ وَلَٰكِن لِّيَطۡمَئِنَّ قَلۡبِيۖ قَالَ فَخُذۡ أَرۡبَعَةٗ مِّنَ ٱلطَّيۡرِ فَصُرۡهُنَّ إِلَيۡكَ ثُمَّ ٱجۡعَلۡ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٖ مِّنۡهُنَّ جُزۡءٗا ثُمَّ ٱدۡعُهُنَّ يَأۡتِينَكَ سَعۡيٗاۚ وَٱعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٞ

Transliteration: (Wa iz qaala Ibraaheemu Rabbi arinee kaifa tuhyil mawtaa qaala awa lam tu'min qaala balaa wa laakin liyatma'inna qalbee qaala fakhuz arba'atan minat tairi fasurhunna ilaika summaj 'al 'alaa kulli jabalin minhunna juz'an summad'uu hunna ya'teenaka sa'yaa; wa'lam annal laaha 'Azeezun Hakeem)

260. "और जब इब्राहीम (अ.स.) ने कहा: 'हे मेरे रब! मुझे दिखा कि आप मृतकों को कैसे जीवित करते हैं।' उसने (अल्लाह ने) कहा: 'क्या तुम यकीन नहीं करते?' उसने कहा: 'जी हां, लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरा दिल शांति से भर जाए।' उसने कहा: 'चार पक्षी ले आओ और उन्हें परिचित बना लो। फिर उनके हर हिस्से को एक-एक पहाड़ी पर रख दो। फिर उन्हें पुकारो। वे तुम्हारे पास दौड़ते हुए आ जाएंगे। और जान लो कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला और बेहद समझदार है।'" [677] [678] [679] [680] [681] [682] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 260 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[677] हज़रत इब्राहीम (अ.स.) की मुराद

  • हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने एक बार समुद्र के किनारे पर एक मृत शरीर को देखा था। उच्च ज्वार में मछलियाँ उसे खा जातीं और नीच ज्वार में जंगली जानवर और पक्षी उसे खा जाते।
  • इस दृश्य ने ज़िंदगी और मौत के रहस्य को समझने की इच्छा पैदा की, और हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने अल्लाह से यह सवाल पूछा कि वह मृतकों को कैसे जीवित करते हैं। यह प्रश्न शुद्ध जिज्ञासा और अदृश्य ज्ञान के प्रति उनकी गहरी इच्छा से था।

[678] विश्वास से यक़ीन तक का सफर

  • हज़रत इब्राहीम (अ.स.) पहले से ही आख़िरत में यकीन रखते थे, लेकिन उन्होंने यह चाहा कि उनका दिल संतुष्ट हो, यानी वह आत्मिक रूप से पूर्ण यकीन करना चाहते थे।
  • यह एक महत्वपूर्ण सिखावनी है कि एक व्यक्ति को न केवल बौद्धिक विश्वास बल्कि सीधा अनुभव चाहिए ताकि उसका विश्वास और मजबूत हो सके।

[679] पक्षियों को परिचित करना

  • अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम (अ.स.) को चार पक्षियों को चुनने और उन्हें अच्छी तरह से परिचित बनाने का आदेश दिया ताकि वह उन्हें पुनः जीवित होने के बाद पहचान सकें।
  • इस प्रक्रिया से यह दिखाया गया कि एक वस्तु को पहचानने के लिए पहले उसे संगत करना ज़रूरी है।

[680] मृतकों को बुलाना और आशीर्वाद प्राप्त करना

  • अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम (अ.स.) को आदेश दिया कि वह चार पक्षियों को हर पहाड़ी पर उनका मांस रखकर पुकारें।
  • इस घटना से यह शिक्षा मिलती है कि अगर पक्षियों को बुलाना संभव है, तो पिछले नबियों और संतों से भी उनकी आशीर्वाद और आध्यात्मिक सहायता प्राप्त करने के लिए उन्हें पुकारना सिद्ध है।

[681] चमत्कारी पुनर्जीवन

  • हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने जो चार पक्षी चुने थे, वे थे:
    • मोर
    • मुर्गा
    • कबूतर
    • कौआ
  • उन्होंने इन पक्षियों को मारा, उनका मांस मिश्रित किया और चार पहाड़ियों पर उनका मांस रख दिया। इसके बाद जब उन्होंने इन्हें पुकारा, तो अल्लाह की अनुमति से पक्षियों के हड्डियाँ और मांस फिर से जुड़ने लगे और पक्षी दौड़ते हुए उनकी ओर वापस लौट आए।
  • यह एक चमत्कारी दृश्य था जो हज़रत इब्राहीम (अ.स.) को यह दिखाने के लिए था कि अल्लाह के पास जीवन और मृत्यु पर पूर्ण नियंत्रण है।

[682] इस घटना से शिक्षा

  • जब एक व्यक्ति या नबी ईश्वर से गहरी इच्छा और धैर्य के साथ कुछ मांगता है, तो अल्लाह उसे अपने हिकमत (समझ) और रहम (कृपा) के साथ पूरी करता है।
  • हज़रत इब्राहीम (अ.स.) का अनुभव यह दर्शाता है कि इमान बिल-ग़ैब (अदृश्य पर विश्वास) एक मومن के लिए आवश्यक है, लेकिन कभी-कभी नबियों को सीधे अनुभव द्वारा विश्वास और मजबूत किया जाता है। यह उन्हें अधिक दृढ़ विश्वास प्रदान करता है, जैसे हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को मीराज के दौरान स्वर्ग और नरक का दृश्य दिखाई दिया।

निष्कर्ष:

इस आयत से हमें यह समझने को मिलता है कि अल्लाह की शक्ति और समझ किसी भी चीज़ पर है, चाहे वह जीवन और मृत्यु हो। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) का यह अनुभव इस बात का गवाह है कि सिर्फ विश्वास ही नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभव भी आवश्यक है, ताकि व्यक्ति का विश्वास और ज्ञान सर्वोत्तम हो। यह एक बड़ा चमत्कारी अवसर था, जो ईश्वर के पूर्ण नियंत्रण और ताकत को दर्शाता है।

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