कुरान - 2:41 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

41
وَءَامِنُواْ بِمَآ أَنزَلۡتُ مُصَدِّقٗا لِّمَا مَعَكُمۡ وَلَا تَكُونُوٓاْ أَوَّلَ كَافِرِۭ بِهِۦۖ وَلَا تَشۡتَرُواْ بِـَٔايَٰتِي ثَمَنٗا قَلِيلٗا وَإِيَّـٰيَ فَٱتَّقُونِ

Transliteration: (Wa aaminoo bimaaa anzaltu musaddiqal limaa ma'akum wa laa takoonooo awwala kaafirim bihee wa laa tashtaroo bi Aayaatee samanan qaleelanw wa iyyaaya fattaqoon)

[41] और उस (क़ुरआन) पर ईमान लाओ जो मैंने नाज़िल किया है, जो उस (तौरेत) की तस्दीक़ करता है जो तुम्हारे पास है [79], और तुम सबसे पहले उसके इनकार करने वाले न बनो [80], और मेरी आयतों को थोड़े से दामों में न बेचो [81], और मुझी से डरते रहो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 41 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

🔹 [79] क़ुरआन पिछले आसमानी किताबों की तस्दीक करता है

  • अल्लाह बनी इस्राईल से कह रहे हैं कि जो किताब मैंने नाज़िल की (यानि क़ुरआन), वो उसी किताब की सच्चाई की गवाही देती है जो तुम्हारे पास पहले से है (यानि तौरेत व इंजील)।
  • इनमें नबी आख़िरुज़्ज़मा ﷺ की आने की पेशगोई थी, और क़ुरआन उसका सबूत और मोहर है।

✅ इससे साफ़ पता चलता है:

  • क़ुरआन ना सिर्फ नई हिदायत है, बल्कि पिछली हिदायत की तस्दीक़ (सत्यता की पुष्टि) भी है।
  • और अब क़ुरआन के आने के बाद कोई नई किताब या नबी नहीं आएगा।

🔸 [80] पहले इनकार करने वाले मत बनो

  • यहूदी उलेमा को चेतावनी दी गई कि:

    "तुम पहले काफ़िर न बनो", यानी जब तुम्हें सच्चाई सबसे पहले पता चली,
    तो तुम ही सबसे पहले उसका इनकार कैसे कर सकते हो?

➡️ क्योंकि जब किसी क़ौम या लीडरशिप क्लास का इनकार होता है,
तो आम लोग भी उनके पीछे चलकर इनकार कर बैठते हैं।

✅ इसलिए उलमा, रहनुमा और बड़ों पर ज़्यादा ज़िम्मेदारी होती है।

🔸 [81] मेरी आयतों को थोड़े से दामों में न बेचो

  • यहाँ पर यहूद के कुछ आलिमों की बदनीयती और लालच पर चेतावनी दी गई है:
    • वो सच्चाई को छुपा देते, या बदल देते, ताकी:
      • उन्हें दौलत मिले,
      • लोगों की वाहवाही मिले,
      • हुकूमतों से रिश्ता बने।

➡️ अल्लाह फ़रमाता है: "मेरी आयतों को थोड़े से फायदे के लिए मत बेचो!"

✅ इसका मतलब यह नहीं कि:

  • कुरआन की तालीम देने पर तनख्वाह लेना हराम है,
  • या इमामत करना नाजायज़ है।

❗ बात उन लोगों की है जो हक़ को छुपा कर, या धोखे से,
दुनियावी मक़सद के लिए दीन को बेचते हैं।

✅ सबक़

  1. क़ुरआन पिछले आसमानी किताबों की सच्चाई का सबूत है — इस पर ईमान ज़रूरी है।
  2. जो लोग सच्चाई को सबसे पहले जानें, उनकी जिम्मेदारी सबसे बड़ी है।
  3. दीन की बातों का सौदा करना — चाहे थोड़ा फायदा ही क्यों न हो — बड़ा गुनाह है।
  4. डरना सिर्फ अल्लाह से चाहिए — क्योंकि वही आख़िर में हिसाब लेगा।

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