कुरान - 2:42 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

42
وَلَا تَلۡبِسُواْ ٱلۡحَقَّ بِٱلۡبَٰطِلِ وَتَكۡتُمُواْ ٱلۡحَقَّ وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa laa talbisul haqqa bilbaatili wa taktumul haqqa wa antum ta'lamoon)

[42] और सच्चाई को झूठ के साथ न मिलाओ, और न सच्चाई को छुपाओ [82], जब कि तुम उसे जानते हो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 42 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

🔹 [82] हक़ से मतलब है नबी ﷺ की सच्ची पहचान

  • इस आयत में "हक़" से मुराद है:
    • नबी करीम ﷺ की वो सिफ़ात (गुण) और निशानियाँ जो यहूद की किताब (तौरेत) में साफ़ लिखी थीं।
    • यहूदी आलिम जानते थे कि नबी आख़िरुज़्ज़मा ﷺ वही हैं जिनका वादा किया गया था।

➡️ लेकिन उन्होंने:

  • सच्चाई को छुपाया,
  • झूठ को मिला कर बात को बिगाड़ा,
  • ताकि लोग नबी ﷺ पर ईमान न लाएं।

🔸 जान-बूझ कर सच्चाई छुपाना बड़ा गुनाह है

  • इस आयत में साफ़ चेतावनी है:
    • "जब तुम सच्चाई जानते हो, तो उसे छुपाना हराम है।"
    • सच्चाई में झूठ मिला देना — यानी लोगों को गुमराह करना — बहुत बड़ा ज़ुल्म है।

✅ इस आयत की हिदायत आज के दौर में भी लागू होती है:

  • कोई आलिम, नेता या ज़िम्मेदार शख्स अगर हक़ जानता है,
    तो उस पर फ़र्ज़ है कि उसे खुले तौर पर बयान करे,
    ना छुपाए, और ना उसमें मिलावट करे।

✅ सबक़

  1. सच्चाई को छुपाना और उसमें झूठ मिलाना दोनों ही हराम हैं।
  2. नबी ﷺ की पहचान और गुण तौरेत में दर्ज थे — उन्हें छुपाना ज़ुल्म था।
  3. जो सच्चाई को जानता है, उसकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
  4. आज भी हमें चाहिए कि सच्चे इल्म और दीन की बात खुलकर बयान करें — बिना डर और मिलावट के।

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