कुरान - 2:44 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

44
۞أَتَأۡمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلۡبِرِّ وَتَنسَوۡنَ أَنفُسَكُمۡ وَأَنتُمۡ تَتۡلُونَ ٱلۡكِتَٰبَۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Ataamuroonan naasa bilbirri wa tansawna anfusakum wa antum tatloonal Kitaab; afalaa ta'qiloon)

[44] क्या तुम लोगों को नेकी का हुक्म देते हो [85], और खुद को भूल जाते हो [86], जबकि तुम किताब की तिलावत करते हो? तो क्या तुम समझते नहीं? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 44 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

🔹 [85] दूसरों को नेकी की नसीहत — मगर खुद उस से दूर?

  • यह आयत यहूदी उलमाओं की दोरंगी रवैय्ये पर एक सख़्त टोका है:
    • वे अपने रिश्तेदारों को इस्लाम क़ुबूल करने की नसीहत करते थे।
    • क्योंकि उन्हें तौरेत से मालूम था कि हज़रत मुहम्मद ﷺ ही आख़िरी नबी हैं।
  • मगर इसके बावजूद, खुद इस्लाम में दाख़िल नहीं होते थे।

✅ अल्लाह फ़रमा रहे हैं:

“तुम दूसरों से नेकी की बात कहते हो — मगर खुद अमल नहीं करते?
क्या तुममें अक़्ल नहीं?”

🔸 [86] वो जो कहते हैं, मगर करते नहीं

  • यह आयत हर उस शख्स के लिए एक चेतावनी है:
    • जो दूसरों को दीन की बातें बताता है,
    • लेकिन खुद उसी पर अमल नहीं करता।

🧠 असल असरदार दावत वो होती है:

  • जो सिर्फ़ ज़बान से नहीं,
  • बल्कि अपने अमल और किरदार से दी जाए।

✅ हदीस में आता है:

“क़यामत के दिन एक आदमी लाया जाएगा जो लोगों को भलाई सिखाता था, मगर खुद उस पर अमल नहीं करता था — तो वो जहन्नम में फेंका जाएगा।”

✅ सबक़

  1. अच्छी बात कहना एक जिम्मेदारी है — लेकिन उससे बड़ी जिम्मेदारी है खुद उस पर अमल करना।
  2. दावत-ए-हक़ (सच्चाई की दावत) सिर्फ़ भाषणों से नहीं, शख्सियत से दी जाती है।
  3. जो लोग दीन की बातें पढ़ते और सिखाते हैं, उन्हें खुद सबसे पहले उस पर चलना चाहिए।

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