कुरान - 2:45 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

45
وَٱسۡتَعِينُواْ بِٱلصَّبۡرِ وَٱلصَّلَوٰةِۚ وَإِنَّهَا لَكَبِيرَةٌ إِلَّا عَلَى ٱلۡخَٰشِعِينَ

Transliteration: (Wasta'eenoo bissabri was Salaah; wa innahaa lakabee ratun illaa alal khaashi'een)

[45] और सब्र और नमाज़ से मदद माँगो। बेशक यह (नमाज़) बहुत भारी है, मगर उन लोगों पर नहीं जो विनम्र और झुके हुए हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 45 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

🔹 सब्र और नमाज़ — अल्लाह की मदद पाने का रास्ता

  • अल्लाह तआला हमें दो चीज़ों का सहारा लेने का हुक्म दे रहे हैं:
    1. सब्र (धैर्य) — मुसीबतों और आज़माइशों में न घबराना।
    2. नमाज़ (सलात) — अपने रब से रुहानी रिश्ता बनाना।

🕌 नमाज़ एक ऐसी इबादत है जो:

  • अल्लाह से सीधा संवाद है,
  • दिल को सुकून देती है,
  • और परेशानियों में सबर की ताक़त देती है।

🔸 नमाज़ भारी क्यों लगती है?

  • बहुत से लोगों को नमाज़ बोझ जैसी लगती है।
  • इसकी वजह:
    • दिल की ग़फ़लत (बेपरवाही),
    • दुनियावी उलझनें,
    • और खुदा से दूरी।

✅ लेकिन जिनके दिल अल्लाह के खौफ और मोहब्बत से झुके हुए हैं,

  • उनके लिए नमाज़ रूह की राहत बन जाती है।

✅ सबक़

  1. परेशानी में सबसे पहले सब्र और नमाज़ की तरफ़ दौड़ो, किसी इंसान की नहीं।
  2. नमाज़ उन्हीं के लिए आसान है जो दिल से अल्लाह को चाहते हैं।
  3. अगर नमाज़ भारी लग रही है — तो दिल की विनम्रता और ख़ुशू' को बढ़ाओ।

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