कुरान - 2:39 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

39
وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَكَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَآ أُوْلَـٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ

Transliteration: (Wallazeena kafaroo wa kaz zabooo bi aayaatinaa ulaaa'ika Ashaabun Naari hum feehaa khaalidoon)

[39] और जो लोग इनकार करेंगे और हमारी आयतों को झुटलाएँगे, वे जहन्नम वाले होंगे, और हमेशा उसी में रहेंगे। [77] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 39 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

🔹 [77] साफ़ हिदायत के बाद इनकार करने वालों का अंजाम

इस आयत में अल्लाह तआला ने उस समूह का अंजाम बयान किया है जो:

➤ ईमान नहीं लाता,
➤ और अल्लाह की निशानियों को झुटलाता है,
➤ जबकि उन्हें नबी की तरफ़ से साफ़ हिदायत मिल चुकी होती है।

✅ ऐसे लोग जहन्नम के हक़दार हैं और हमेशा उसी में रहेंगे।
यह सज़ा हमेशा की है, लेकिन यह सख्त हुक्म उन पर लागू होता है जिन्होंने:

  • नबी की बातें खुलकर सुन लीं,
  • सच्चाई को समझ लिया,
  • फिर भी ज़िद या तकब्बुर की वजह से इंकार कर दिया।

➡️ लेकिन जो लोग ऐसे दौर में थे जहाँ तक नबी की दावत नहीं पहुँची, जैसे:

  • इस्लाम से पहले के लोग,
  • या जो दूर-दराज़ इलाक़ों में थे और उन्हें हक़ की खबर नहीं पहुँची—

उन पर यह हुक्म नहीं लागू होता। उनके लिए सिर्फ़ तौहीद (अल्लाह की एकता) को मानना ही नजात का ज़रिया है।

📌 इस आयत की रोशनी में उलमा ने यह हुक्म निकाला कि:

हज़रत रसूलुल्लाह ﷺ के वालिदैन, जो नुबूवत से पहले के दौर में थे,
उन्हें हिदायत नहीं पहुँची थी, और वे मुवह्हिद (एक अल्लाह को मानने वाले) थे।
इसलिए वे बरी (गुनाहों से पाक) और माफ़ किए गए हैं।

✅ सबक़:
अल्लाह का इंसाफ़ बहुत ही दयानतदार और हिकमत वाला है।
किसी पर सज़ा उसी वक़्त होती है जब:

  1. सच्चाई उसके सामने पेश कर दी गई हो,
  2. समझने की पूरी क़ाबिलियत मौजूद हो,
  3. फिर जान-बूझकर इंकार किया जाए।

➤ अल्लाह हिदायत की क़दर करने वालों को सुकून और नजात देता है,
और ज़िद्दी इनकार करने वालों को जहन्नम का अंजाम।

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