कुरान - 2:65 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

65
وَلَقَدۡ عَلِمۡتُمُ ٱلَّذِينَ ٱعۡتَدَوۡاْ مِنكُمۡ فِي ٱلسَّبۡتِ فَقُلۡنَا لَهُمۡ كُونُواْ قِرَدَةً خَٰسِـِٔينَ

Transliteration: (Wa laqad 'alimtumul lazeena'-tadaw minkum fis Sabti faqulnaa lahum koonoo qiradatan khaasi'een)

[65] और यक़ीनन तुम उन्हें जानते हो जिन्होंने सब्त (शनिवार) के बारे में हुक्म तोड़ा [120]। तो हमने उनसे कहा: "हो जाओ बंदर, [121] रुसवा किए गए।” (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 65 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[120] सब्त के दिन नाफ़रमानी का गुनाह

  • यह घटना आइला नामक जगह की है जो मदीना और सीरिया के बीच लाल सागर के किनारे पर स्थित था।
  • हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) के ज़माने में यहूदी क़ौम को हुक्म था कि शनिवार को कोई शिकार न करें।
  • लेकिन उन्होंने चालाकी से दरिया के किनारे गड्ढे बनाए, ताकि मछलियाँ शनिवार को फँस जाएँ और फिर वो उन्हें रविवार को निकाल लें।
  • यह धोखेबाज़ी वाला काम 70 साल तक चलता रहा — और फिर अल्लाह का अज़ाब (सज़ा) उन पर आ गया।
    🔹 इससे पता चलता है कि छोटा गुनाह भी अगर बार-बार और लगातार किया जाए, तो वो बड़ा गुनाह बन जाता है।

[121] बंदर बना दिए गए — लेकिन रूह नहीं बदली

  • अल्लाह ने उन लोगों को सज़ा में उनके चेहरे बंदरों जैसे बना दिए।
  • लेकिन उनके जिस्म और रूह (आत्मा) इंसानों जैसी ही रही।
  • इस से यह साबित होता है कि यह कोई रूह की तब्दीली (transmigration) नहीं थी।
  • यह आयत आत्मा के पुनर्जन्म (reincarnation) के झूठे विचार को खारिज करती है।

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