Transliteration: (Wa iz akhaznaa meesaaqakum wa rafa'naa fawqakumut Toora khuzoo maaa aatainaakum biquwwatinw wazkuroo maa feehi la'allakum tattaqoon)
यह घटना बनी इसराईल के कूच से पहले की है। हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उन 70 साथियों से, जो उनके साथ कोह-ए-तूर पर गए थे, यह अहद लिया था कि वे तौरात की शिक्षाओं का पालन करेंगे। इसका यह मतलब भी हो सकता है कि जब तौरात नाज़िल हुई, तो हज़रत मूसा ने पूरी क़ौम से इसे मानने का एलान किया। इससे हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह के नेक बंदों की तालीम दरअसल अल्लाह की तालीम होती है, क्योंकि वह उसी से जुड़ी होती है। हालांकि वाचा हज़रत मूसा ने ली थी, मगर अल्लाह ने फ़रमाया: "हमने वाचा ली", जिससे पता चलता है कि पैग़म्बरों के किए हुए अमल अल्लाह के अमल माने जाते हैं। उसी तरह, हालांकि कोह-ए-तूर को हज़रत जिबरील ने उठाया था, लेकिन अल्लाह फ़रमाता है “हमने उठाया”, क्योंकि सब कुछ उसी की मर्ज़ी से होता है।
तौरात एक साथ नाज़िल हुई थी, और उसके सारे अहकाम भी एक साथ लाज़िमी हो गए थे, जिन्हें बनी इसराईल ने मानना मुश्किल समझा। तब अल्लाह तआला ने तूर पहाड़ को उनके ऊपर उठाया ताकि डर और संजीदगी पैदा हो जाए, और उन्हें आगाह किया गया कि अगर उन्होंने अहकाम न माने तो पहाड़ उनके ऊपर गिर पड़ेगा। यह दिखाता है कि मुसलमान कितने खुशक़िस्मत हैं कि क़ुरआन 23 सालों में धीरे-धीरे नाज़िल हुआ, ताकि समझना और उस पर अमल करना आसान हो।
वो सारी जिस्मानी मुश्किलें जो हिदायत का ज़रिया बनें, रहमत में शुमार होती हैं—जैसे कोह-ए-तूर को उठाया जाना। तौरात की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी बनी इसराईल पर डाली गई थी, जैसा कि कहा गया: “जो कुछ हमने तुम्हें दिया है, उसे पकड़ो।” लेकिन वे इसमें नाकाम रहे। मगर क़ुरआन की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने खुद ले ली है, इसलिए यह क़यामत तक महफूज़ रहेगा।
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