Transliteration: (Wa iz qultum yaa Moosaa lan nasbira 'alaa ta'aaminw waahidin fad'u lanaa rabbaka yukhrij lanaa mimmaa tumbitul ardu mimbaqlihaa wa qis saaa'ihaa wa foomihaa wa 'adasihaa wa basalihaa qaala atastabdiloonal lazee huwa adnaa billazee huwa khayr; ihbitoo misran fa inna lakum maa sa altum; wa duribat 'alaihimuz zillatu walmaskanatu wa baaa'oo bighadabim minal laah; zaalika bi annahum kaano yakfuroona bi aayaatil laahi wa yaqtuloonan Nabiyyeena bighairil haqq; zaalika bimaa 'asaw wa kaanoo ya'tadoon)
✅ [110] नेक लोगों से दुआ माँगना
यह आयत हमें यह समझने में मदद करती है कि नेक लोगों से अपने लिए दुआ करने की दरख़्वास्त करना जायज़ है। इसी तरह, ज़रूरत और परेशानी में नेक लोगों की तरफ़ रुख करना भी जायज़ है। बनी इसराईल इसका उदाहरण हैं — जब भी उन्हें अल्लाह की मदद चाहिए होती, वे पहले अपनी ज़रूरत हज़रत मूसा से कहते थे।
✅ [111] लालच और संतोष की कमी
यह घटना “तीह” में हुई थी। जब बनी इसराईल मन व सलवा से भर चुके थे, तो उन्होंने हज़रत मूसा से सब्ज़ियाँ और अनाज के लिए दुआ माँगी। इससे यह बात उजागर होती है कि लालच और ज़्यादा पाने की चाहत अल्लाह की नज़रों में बुरी है, और हमें अल्लाह की नेमतों के लिए शुक्रगुज़ार रहना चाहिए।
✅ [112] अल्लाही आसानी को छोड़ना और दुनियावी मशक्कत चाहना
ऐसी स्थिति जो बिना ज़्यादा मेहनत के हासिल हो और नाजायज़ तरीकों से बचाए, वह अल्लाह की तरफ़ से बरकत है। यह उस चीज़ से कहीं बेहतर है जो मुश्किल तरीक़ों से या हराम रास्तों से हासिल हो।
✅ [113] गुनाह और नबियों का अपमान
इस आयत से दो अहम बातें निकलती हैं: गुनाह की वजह से दुनिया की मुसीबतें आती हैं, और अल्लाह के नबियों की तौहीन से दुनिया और आख़िरत दोनों में ज़िल्लत मिलती है। इसके उलट, नबियों का सम्मान करने से इज़्ज़त और रूहानी बुलंदी मिलती है। "वे" से मुराद वही बनी इसराईल हैं जिन्होंने ऊपर बताए गए गुनाह किए। इसी वजह से उन्हें इज़्ज़त, शोहरत और माल-दौलत नसीब नहीं हुई। हालांकि, अगर बाद की नस्लों को कभी दौलत या ताक़त मिली — जैसे कि फ़िलिस्तीन में यहूदियों की हुकूमत बनी — तो वह इस आयत के खिलाफ़ नहीं जाती।
✅ [114] नबियों की शहादत और उसका मक़सद
नबियों का क़त्ल नाइंसाफ़ी समझा जाता था — यहां तक कि बनी इसराईल के अपने धर्म में भी। नियम यह था कि किसी नबी का क़त्ल करना जुल्म है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि सिर्फ़ उन्हीं नबियों को शहीद किया गया जिन पर जिहाद फ़र्ज़ नहीं था — जैसे हज़रत ज़करिया (अ.स) और हज़रत शुऐब (अ.स)। हज़रत याह्या (अ.स) को काफ़िरों ने शहीद किया, जिनके ख़िलाफ़ जिहाद का एलान था। फिर भी इनकी शहादत उनके मिशन की तकमील का ज़रिया बनी। इसलिए यह आयत उनकी कामयाबी का इनकार नहीं करती — जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया:
“और यह हमारी रहमत है कि हम मुसलमानों की मदद करते हैं।” (सूरह अ-रूम: 47)
“बेशक मैं (अल्लाह) और मेरे सारे रसूल ही ग़ालिब होंगे।” (सूरह अल-मुजादिला: 21)
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat