कुरान - 2:62 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

62
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَٱلَّذِينَ هَادُواْ وَٱلنَّصَٰرَىٰ وَٱلصَّـٰبِـِٔينَ مَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَعَمِلَ صَٰلِحٗا فَلَهُمۡ أَجۡرُهُمۡ عِندَ رَبِّهِمۡ وَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُونَ

Transliteration: (Innal lazeena aamanoo wallazeena haadoo wan nasaaraa was Saabi'eena man aamana billaahi wal yawmil aakhiri wa 'amila saalihan falahum ajruhum 'inda Rabbihim wa laa khawfun 'alaihim wa laa hum yahzanoon)

यक़ीनन, जो लोग ईमान लाए, यहूदी, नसारा और साबिईन — जो कोई भी अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान लाएगा और अच्छे अमल करेगा — उनके लिए उनके रब के पास उनका बदला [115] है। उन पर कोई ख़ौफ़ न होगा, और न ही वे ग़मज़दा होंगे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 62 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

✅ [115] सच्चा ईमान वही है जिसमें नबी ﷺ पर ईमान शामिल हो
यह आयत इस ओर इशारा करती है कि कुफ़्र की हालत में जो भी भलाई किसी ने की थी, वह इस्लाम कबूल करने के बाद नेकियों में बदल जाती है। इस्लाम पिछले गुनाहों को मिटा देता है, लेकिन पिछले नेक कामों को नहीं मिटाता। हालांकि, इसमें इस्लाम के बुनियादी अरकान शामिल नहीं होते। मसलन, अगर कोई व्यक्ति इस्लाम से पहले हज या नमाज़ अदा कर चुका हो, तो वह क़ुबूल नहीं होती, क्योंकि इस्लाम उनका शर्त है।

अल्लाह पर ईमान लाने का मतलब है — अल्लाह पर ईमान लाना उस तरह से जैसे हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ ने सिखाया है। वरना नसारा (ईसाई) और यहूद (यहूदी) भी अल्लाह और क़ियामत के दिन पर ईमान लाने का दावा करते थे। लेकिन अब अल्लाह पर ईमान लाने की जो शर्त है, वह वही है जो इस्लाम ने तय की है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“और जो कोई इस्लाम के अलावा किसी और दीन की तलाश करेगा, तो वह उससे कभी क़ुबूल नहीं किया जाएगा।” (सूरह आले-इमरान: 85)

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