कुरान - 2:91 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

91
وَإِذَا قِيلَ لَهُمۡ ءَامِنُواْ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُواْ نُؤۡمِنُ بِمَآ أُنزِلَ عَلَيۡنَا وَيَكۡفُرُونَ بِمَا وَرَآءَهُۥ وَهُوَ ٱلۡحَقُّ مُصَدِّقٗا لِّمَا مَعَهُمۡۗ قُلۡ فَلِمَ تَقۡتُلُونَ أَنۢبِيَآءَ ٱللَّهِ مِن قَبۡلُ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Wa izaa qeela lahum aaminoo bimaaa anzalal laahu qaaloo nu'minu bimaaa unzila 'alainaa wa yakfuroona bimaa waraaa'ahoo wa huwal haqqu musaddiqal limaa ma'ahum; qul falima taqtuloona Ambiyaaa'al laahi min qablu in kuntum mu'mineen)

[91] और जब उनसे कहा जाता है: "उस चीज़ पर ईमान लाओ जो अल्लाह ने नाज़िल की है," [172] तो वे कहते हैं: "हम तो बस उसी पर ईमान लाते हैं जो हम पर नाज़िल किया गया।" और जो उसके अलावा आया है, उसे झुटलाते हैं, हालाँकि वह सच्चाई है, और उस (किताब) की तस्दीक़ करता है जो उनके पास है [173]। कह दीजिए (हे मुहम्मद): "फिर क्यों तुम पहले अल्लाह के पैग़म्बरों को क़त्ल करते थे, [174] अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो?" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 91 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[172] तमाम आसमानी किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाना फ़र्ज़ है

इस आयत से साफ़ होता है कि हर मुसलमान पर यह फ़र्ज़ है कि वह:

  • तमाम आसमानी किताबों,
  • तमाम अल्लाह के पैग़म्बरों,
  • और हमारे आख़िरी नबी ﷺ के हर हुक्म पर ईमान लाए।
    अगर कोई इनमें से किसी एक को भी नहीं माने तो वह काफ़िर है। यही हुक्म नबी के पाक ख़ानदान और सहाबा की अज़मत को मानने पर भी लागू होता है।

[173] क़ुरआन — पहले भेजी गई किताबों की तस्दीक़ करता है

क़ुरआन सच्चाई है और वह पहले आई किताबों की तस्दीक़ करता है। मगर अब जिन किताबों और नबियों का ज़िक्र क़ुरआन में नहीं है, उनका सही इल्म हमारे पास नहीं है। इसलिए अब क़ुरआन ही आख़िरी और महफूज़ मयार है जो बीती किताबों और नबियों की सच्चाई की गवाही देता है।

[174] नबियों का क़त्ल या बेअदबी — खुला कुफ्र है

इस आयत से यह भी साबित होता है कि किसी नबी की बेअदबी या उन्हें क़त्ल करना खुला कुफ्र है। और जो लोग उन नबियों के क़ातिलों की ताईद करते हैं या उन्हें इज़्ज़त देते हैं, वो भी इसी गुनाह में शरीक हैं। जैसे आज के यहूदी उन लोगों को इज़्ज़त देते हैं जिन्होंने नबियों को क़त्ल किया — इसलिए वो भी गुनाहगार हैं। जिस तरह नेकियों के साथ देने पर सवाब मिलता है, उसी तरह कुफ्र की ताईद करना भी कुफ्र ही होता है।

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