कुरान - 2:94 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

94
قُلۡ إِن كَانَتۡ لَكُمُ ٱلدَّارُ ٱلۡأٓخِرَةُ عِندَ ٱللَّهِ خَالِصَةٗ مِّن دُونِ ٱلنَّاسِ فَتَمَنَّوُاْ ٱلۡمَوۡتَ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ

Transliteration: (Qul in kaanat lakumud Daarul Aakhiratu 'indal laahi khaalisatam min doonin naasi fatamannawul mawta in kuntum saadiqeen)

[94] कह दो (ऐ मुहम्मद), "अगर आख़िरत का घर (जन्नत) अल्लाह के पास सिर्फ़ तुम्हारे लिए है और बाकी लोगों के लिए नहीं, तो मौत की तमन्ना करो, अगर तुम [180] सच्चे हो।" [181] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बक़रा आयत 94 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[180] बनी इसराईल का झूठा घमंड

  • यहूद यह घमंड रखते थे कि जन्नत सिर्फ़ उन्हीं के लिए है, क्योंकि वे नबियों की औलाद हैं — चाहे उनके आमाल कैसे भी हों।
  • वे मुसलमानों को जन्नत से महरूम समझते थे, भले ही वे कितने भी नेक क्यों न हों।
  • अल्लाह ने उनके इस झूठे दावे को चुनौती दी:
    "अगर तुम सच्चे हो तो मौत की तमन्ना करो।"
  • क्योंकि जो वाकई जन्नत को अपना समझता है, वह मौत की ख्वाहिश ज़रूर करेगा — क्योंकि मौत ही जन्नत का दरवाज़ा है।
  • मगर उनका मौत से भागना ही उनके दावे के झूठे होने का सबूत है।

[181] इस्लाम में मौत की तमन्ना करने का सही तरीका

  • इस्लाम दो तरह की मौत की तमन्ना में फर्क करता है:
    ✅ अल्लाह से मिलने की चाहत या हुज़ूर ﷺ से मुलाक़ात की तमन्ना — यह जायज़ और काबिले-तारीफ़ है।
    ❌ दुनियावी मुश्किलों, दर्द या मायूसी से भागने के लिए मौत की ख्वाहिश — यह हराम है।
  • इस आयत में यहूद के घमंडी दावे की बात हो रही है, न कि किसी सच्चे मोमिन की रूहानी तमन्ना की।
  • साथ ही इस्लाम में ख़ुदकुशी हर हाल में हराम है, चाहे वजह कुछ भी हो।
  • सही मायनों में मौत की ख्वाहिश तब जायज़ है जब वह अल्लाह की रज़ा और दीदार के लिए हो, न कि दुनियावी दुख से भागने के लिए।

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