कुरान - 98:1 सूरह अल-बय्यिना अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
لَمۡ يَكُنِ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ وَٱلۡمُشۡرِكِينَ مُنفَكِّينَ حَتَّىٰ تَأۡتِيَهُمُ ٱلۡبَيِّنَةُ

Transliteration: (Lam ya kunil lazeena kafaru min ahlil kitaabi wal mushri keena mun fak keena hattaa ta-tiya humul bayyinah)

1. किताब वालों में से जिन लोगों ने कुफ़्र किया और मुशरिक, वे अपनी हालत से न निकलते [1], जब तक उनके पास साफ़ निशानी न आ जाती [2]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-बय्यिना आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

अरब के ईसाई, यहूदी और मुशरिकों का ज़िद्दी एतकाद


अरब के ईसाई, यहूदी (अहले-किताब) और मुशरिक (बुतपरस्त) अपने कुफ़्र और हठधर्मी में इतने अड़े हुए थे कि किसी भी हाल में अपना दीन छोड़ने को तैयार नहीं थे। इसकी दो वजहें थीं:

अरब के लोग बेहद सख़्त दिल और बाग़ी थे।

हज़रत इसमाईल (अलैहिस्सलाम) के बाद से लेकर पैग़म्बर-ए-आख़िर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आने तक इस इलाक़े में कोई नबी नहीं आया, जिससे उनकी जाहिलियत बढ़ती गई।

आयत से निकलने वाले मुख्य मसाइल

अहले-किताब और मुशरिकों में फर्क

अहले-किताब और मुशरिक दोनों काफ़िर हैं, मगर अहले-किताब का किसी नबी से निस्बत होने की वजह से उनके मामलात में नरमी है। जैसे:

आयत में अहले-किताब का ज़िक्र पहले हुआ।

उनका ज़बीहा किया हुआ जानवर हलाल है।

उनकी औरतों से निकाह जायज़ है।

अगर ईमान लाएँ तो उन्हें दोहरा सवाब मिलेगा।

सोचो, अगर किसी नबी से जुड़े काफ़िरों को इतने फ़ायदे हैं, तो जो मुसलमान ख़ुद पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से ख़ास राब्ता रखे, उसका क्या मुक़ाम होगा?

पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का मुश्किल इंसाफ़

पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ऐसी क़ौम को सुधारा जिसका सुधरना नामुमकिन लगता था। उन्होंने सख़्त दिलों को ईमान की रौशनी से नवाज़ा।

पुरानी आसमानी किताबों का रद्द होना

पहले की किताबें (जैसे तौरात, इंजील) उनके रद्द होने से पहले हिदायत का ज़रिया थीं, लेकिन रद्द होने के बाद उन्हें मानने वालों के लिए गुमराही का सबब बन गया। जैसे पुरानी दवा मरीज़ के लिए नुक़सानदेह हो जाती है।

पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम): "साफ़ सबूत" का मतलब
"बय्यिना" (साफ़ सबूत) से मुराद पैग़म्बर-ए-आख़िर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं, क्योंकि वो:

अल्लाह की वहदानियत (एक होने) की दलील हैं।

हर दीन के उसूल की गवाही देते हैं।

ख़ुद उनकी शख़्सियत एक निशानी है।

मानो अल्लाह फ़रमा रहा हो:

"ऐ मेरे हबीब! अरब वाले तेरी हिदायत का इंतज़ार कर रहे थे।"

"ऐ मेरे हबीब! इस इलाक़े में तेरे सिवा कोई हिदायत देने वाला नहीं था।"

अगर कोई सख़्त और ग़ज़ब वाला नबी भेजा जाता, तो शायद वो नाउम्मीद होकर उन्हें आद और समूद की तरह हलाक कर देता। लेकिन पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें मोमिन बनाया, साथियों का दर्जा दिया, और मक्का-मदीना को आबाद किया।

"साफ़ सबूत" क्यों?

"सबूत" वो है जो दावे को साबित करे, और "साफ़ सबूत" वो जिस पर कोई ऐतराज़ न हो। जैसे सूरज की रोशनी सूरज की मौजूदगी की दलील है, या धुआँ आग का सबूत है, वैसे ही पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ख़ुद हिदायत की ज़िंदा निशानी हैं।

उनके मोजिज़े, उनकी सच्चाई, और बिना किसी उस्ताद के इल्म-ए-ग़ैब (गुप्त ज्ञान) रखना, ये सब उनकी नबूवत के साफ़ सबूत हैं। अल्लाह की कुदरत और पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मोजिज़े उनकी सच्चाई की गवाही देते हैं।

इस तरह, पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को "बय्यिना" (साफ़ सबूत) कहा गया है।

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