Transliteration: (Wa maa kaana linafsin an tamoota illaa bi iznillaahi kitaabam mu'ajjalaa; wa mai yurid sawaabad dunyaa nu'tihee minhaa wa mai yurid sawaabal Aakhirati nu'tihee minhaa; wa sanajzish shaakireen)
इस आयत से यह बात साफ़ होती है कि मौत से कोई नहीं बच सकता, और हर जान की मौत का समय अल्लाह के पास पहले से तय है। इसलिए जान बचाने के लिए जंग से भागना बेकार और निंदनीय है, क्योंकि मौत अपने समय पर ज़रूर आएगी। इसके उलट जो सबर और इस्तिक़ामत से डटा रहता है, उसे मौत अपने वक़्त से पहले नहीं आती, बल्कि अल्लाह का इनाम मिलता है।
"दुनिया का इनाम" उन लोगों की तरफ़ इशारा करता है जो सिर्फ़ माल-ओ-दौलत या ग़नीमत की नीयत से जिहाद करते हैं। ऐसे लोग आख़िरत का इनाम नहीं पाते, क्योंकि अपना हिस्सा वे दुनिया में ही ले चुके होते हैं। फिर भी इसका यह मतलब नहीं कि उन्हें ज़रूर आराम और सकून मिलेगा, इसलिए इस आयत पर कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकती।
"आख़िरत का इनाम" उन लोगों के लिए है जो अल्लाह की रज़ा और जन्नत की नीयत से जिहाद या नेक काम करते हैं। ऐसे लोग दुनिया और आख़िरत दोनों में इनाम के हक़दार होते हैं। इस आयत का यह मतलब नहीं कि उन्हें दुनिया में कुछ नहीं मिलेगा, बल्कि अल्लाह के फ़ज़्ल से दोनों जगह फ़ायदा मिलेगा, बशर्ते नीयत पाक और सच्ची हो।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat