Transliteration: (Wa ka aiyim min Nabiyyin qaatala ma'ahoo ribbiyyoona kaseerun famaa wahanoo limaaa Asaabahum fee sabeelil laahi wa maa da'ufoo wa mas takaanoo; wallaahu yuhibbus saabireen)
इस आयत से पता चलता है कि जिहाद की शुरुआत हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के ज़माने से हुई, जो पहले नबी थे जिन्होंने जिहाद किया। उनके बाद बहुत से नबी अपने अपने शरीअत में अल्लाह के रास्ते में जिहाद करते रहे। यह आयत इस ओर इशारा करती है कि पहले के नबियों ने सख़्त आज़माइशों का सामना किया, लेकिन हक़ की राह में डटे रहे।
"अल्लाह वाले" से मुराद वे औलिया और नेक लोग हैं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी अल्लाह की रज़ा के लिए वक़्फ़ कर दी। सूफ़ियों की इस्तिला में ये वो लोग हैं जो रसूलुल्लाह ﷺ के सच्चे आशिक़ और पैरोक़ार होते हैं। जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है: "जिसने रसूल की इताअत की, उसने अल्लाह की इताअत की" (अन-निसा: 80) और "अगर तुम मेरी पैरवी करो तो अल्लाह तुम्हें मोहब्बत करेगा" (आले-इमरान: 31)।
चूंकि रसूलुल्लाह ﷺ सभी नबियों के सरदार हैं और उनकी उम्मत सब उम्मतों से बेहतर है, इसलिए उम्मत का हौसला और सब्र भी सबसे ऊँचा होना चाहिए। इससे दो बातें मालूम होती हैं:
अल्लाह उन लोगों से मोहब्बत करता है जो सब्र करते हैं, और इसमें ये तीन बातें शामिल हैं:
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