कुरान - 3:146 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

146
وَكَأَيِّن مِّن نَّبِيّٖ قَٰتَلَ مَعَهُۥ رِبِّيُّونَ كَثِيرٞ فَمَا وَهَنُواْ لِمَآ أَصَابَهُمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَمَا ضَعُفُواْ وَمَا ٱسۡتَكَانُواْۗ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلصَّـٰبِرِينَ

Transliteration: (Wa ka aiyim min Nabiyyin qaatala ma'ahoo ribbiyyoona kaseerun famaa wahanoo limaaa Asaabahum fee sabeelil laahi wa maa da'ufoo wa mas takaanoo; wallaahu yuhibbus saabireen)

और कितने ही नबी हुए जिनके साथ अल्लाह वाले बहुत लोग लड़े [312], फिर उन्हें जो कुछ अल्लाह के रास्ते में मुसीबत पहुँची, उससे न तो वे हिम्मत हारे और न ही कमज़ोर पड़े और न ही झुके [313]। और अल्लाह तो सब्र करने वालों को पसंद करता है [314]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 146 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 146 की तफ़्सीर

 

✅ [312] नबियों की सुन्नत में जिहाद भी शामिल है

इस आयत से पता चलता है कि जिहाद की शुरुआत हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के ज़माने से हुई, जो पहले नबी थे जिन्होंने जिहाद किया। उनके बाद बहुत से नबी अपने अपने शरीअत में अल्लाह के रास्ते में जिहाद करते रहे। यह आयत इस ओर इशारा करती है कि पहले के नबियों ने सख़्त आज़माइशों का सामना किया, लेकिन हक़ की राह में डटे रहे।

✅ [313] "अल्लाह वाले" लोग कौन हैं?

"अल्लाह वाले" से मुराद वे औलिया और नेक लोग हैं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी अल्लाह की रज़ा के लिए वक़्फ़ कर दी। सूफ़ियों की इस्तिला में ये वो लोग हैं जो रसूलुल्लाह ﷺ के सच्चे आशिक़ और पैरोक़ार होते हैं। जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है: "जिसने रसूल की इताअत की, उसने अल्लाह की इताअत की" (अन-निसा: 80) और "अगर तुम मेरी पैरवी करो तो अल्लाह तुम्हें मोहब्बत करेगा" (आले-इमरान: 31)।

✅ [314] बेहतर लोगों से ज़्यादा उम्मीद की जाती है

चूंकि रसूलुल्लाह ﷺ सभी नबियों के सरदार हैं और उनकी उम्मत सब उम्मतों से बेहतर है, इसलिए उम्मत का हौसला और सब्र भी सबसे ऊँचा होना चाहिए। इससे दो बातें मालूम होती हैं:

  1. जो दर्जे में ऊँचे हैं, उन्हें अमल में भी ऊँचा होना चाहिए।
  2. रहबर, आलिम और औलिया को दूसरों से ज़्यादा परहेज़गार होना चाहिए।
    अल्लाह का तरीका यही रहा है कि वह पहले के नेक लोगों की मिसालें देकर लोगों को रूहानी ताज़गी और हिम्मत देता है।

✅ [315] सब्र का सही मतलब

अल्लाह उन लोगों से मोहब्बत करता है जो सब्र करते हैं, और इसमें ये तीन बातें शामिल हैं:

  • इबादत और आज्ञापालन में डटे रहना
  • गुनाहों से बचते रहना
  • आज़माइशों में टूटे बिना टिके रहना
    इस आयत में तीसरे दर्जे का सब्र मुराद है — यानी मुसीबतों और जंग के हालात में सब्र करना, जैसा कि इस संदर्भ से ज़ाहिर है।

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