Transliteration: (Fa aataahumul laahu sawaabad dunyaa wa husna sawaabil Aakhirah; wallaahu yuhibbul muhsineen)
दुनिया का इनाम मक्की फ़तह, कामयाबी और इज़्ज़त से है, जबकि आख़िरत का इनाम जन्नत और गुनाहों की माफ़ी है। इससे मालूम होता है कि दीन की ख़िदमत करने वालों को दुनिया में भी नेमतें मिलती हैं, मगर आख़िरत का इनाम ज़्यादा अफ़ज़ल और हमेशा रहने वाला है। इसलिए यहां "भलाई" को अहमियत देकर ज़िक्र किया गया, ताकि रूहानी कामयाबी की क़ीमत को मालूम किया जा सके।
यह कितनी हुस्न की बात है कि ये परहेज़गार लोग खुद को गुनहगार समझते हैं, मगर उनका परवरदिगार उन्हें नेकी करने वाला और नेक बंदा कहता है! इससे मालूम होता है कि इन्किसारी और फ़रमाबरदारी इबादत की बुलंदी है। ऐसे लोग अल्लाह के महबूब होते हैं, जैसा कि ख़ुद अल्लाह फरमाता है: "अल्लाह नेहसान करने वालों से मुहब्बत करता है।"
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