कुरान - 3:156 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

156
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَكُونُواْ كَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَقَالُواْ لِإِخۡوَٰنِهِمۡ إِذَا ضَرَبُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ أَوۡ كَانُواْ غُزّٗى لَّوۡ كَانُواْ عِندَنَا مَا مَاتُواْ وَمَا قُتِلُواْ لِيَجۡعَلَ ٱللَّهُ ذَٰلِكَ حَسۡرَةٗ فِي قُلُوبِهِمۡۗ وَٱللَّهُ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِيرٞ

Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanoo laa takoonoo kallazeena kafaroo wa qaaloo li ikhwaanihim izaa daraboo fil ardi aw kaanoo ghuzzal law kaanoo 'indanaa maa maatoo wa maa qutiloo liyaj'alal laahu zaalika hasratan fee quloobihim; wallaahu yuhyee wa yumeet; wallaahu bimaa ta'maloona Baseer)

ऐ ईमान वालों! उन लोगों जैसे न बनो जिन्होंने अपने भाइयों के बारे में कहा जब वे धरती में सफ़र पर गए या जिहाद के लिए निकले, कि अगर वे हमारे साथ होते तो न मरते और न मारे जाते [350]। यह इसलिए कहा गया ताकि अल्लाह उनके दिलों में इसे अफ़सोस का कारण बना दे [352]। और अल्लाह ही ज़िंदगी देता है और मौत देता है [353]। और अल्लाह तुम्हारे कर्मों को देखता है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 156 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 156 की तफ़्सीर

 

✅ [350] “काफ़िर” और “उनके भाई” कौन हैं?

इस आयत में "काफ़िर" से आशय खुले तौर पर इंकार करने वालों से है, और "उनके भाई" का मतलब है मुनाफिक़, यानी वे लोग जो ऊपर से ईमानदारी दिखाते थे लेकिन भीतर से इनकार करते थे।
ये काफ़िर अफ़सोस जताते थे कि मुनाफिक़ मुसलमानों के साथ जंग में जबरन गए और मारे गए।
एक अन्य व्याख्या के अनुसार, "काफ़िर" मुनाफिक़ हो सकते हैं, और "उनके भाई" से आशय उनके रिश्तेदार सच्चे मुसलमान हो सकते हैं।
इससे दो बातें सामने आती हैं:

  • काफ़िर और मुनाफिक़ एक जैसी सोच रखते हैं
  • मुसलमानों को काफ़िरों की बातों, आदतों और रवैये की नकल नहीं करनी चाहिए। उन्हें अपने आचरण, पहनावे और बोली में गंभीरता और सलीका बनाए रखना चाहिए, और बेक़ाबू, बेसब्र या इंकार से भरे जुमले नहीं बोलने चाहिए।

✅ [351] “काश” और “अगर” कहने का खतरा

इस आयत से हम सीखते हैं कि "अगर वे रुक जाते...", "तो न मरते" जैसी बातें ग़ैर-ईमान वालों की ज़ुबान होती हैं।
एक सच्चा मोमिन अल्लाह की क़ज़ा और क़दर को पूरी तरह कुबूल करता है, और बिना शिकायत के अपने रब की मर्ज़ी में राज़ी रहता है।
ईमान और शंका की सोच में यह फर्क हमेशा रहेगा — मोमिन अल्लाह पर यकीन रखता है, जबकि ग़ैर-ईमान वाला शक करता है।

✅ [352] अफ़सोस — नाशुक्रों का अंजाम

इस आयत से यह हिदायत मिलती है कि जो लोग अल्लाह के फैसलों पर सब्र और शुक्र नहीं करते, उन्हें ज्यादा दुख और तकलीफ उठानी पड़ती है।
इसके बरअक्स, सब्र और शुक्र से दिल को सुकून मिलता है।
जो दुनिया से ज़्यादा मोहब्बत करता है, उसके लिए मौत तकलीफ़देह होती है,
जबकि जो आख़िरत की तरफ़ झुकाव रखता है, उसे मौत की कसक कम लगती है।
इसीलिए औलिया-ए-किराम की वफ़ात को विसाल या उर्स कहा जाता है, यानी अल्लाह से मिलन।

✅ [353] ज़िंदगी और मौत का मालिक सिर्फ अल्लाह

हक़ीक़त यही है कि ज़िंदगी देना और मौत देना सिर्फ अल्लाह का काम है।
हाँ, अल्लाह अपने चुनिंदा बंदों को यह ताक़त देता है लेकिन अपने हुक्म और इजाज़त से।
जैसे कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) कहते हैं:
"मैं मुर्दों को ज़िंदा करता हूँ — अल्लाह के हुक्म से" (सूरा आले-इमरान, 3:49)।
इससे साफ़ होता है कि पैग़म्बर या औलिया जो भी करिश्मा दिखाते हैं, वो अल्लाह की इजाज़त से होता है।

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