Transliteration: (Innal lazeena tawallaw minkum yawmal taqal jam'aani innamas tazallahumush Shaitaanu biba'di maa kasaboo wa laqad 'afal laahu 'anhum; innnal laaha Ghafoorun Haleem)
उहुद की जंग में सिर्फ़ 14 सहाबा — जिनमें हज़रत अबू बक्र, उमर और अली (रज़ि०) शामिल थे — नबी ﷺ के साथ डटे रहे। बाक़ी सहाबा डर और उलझन के मारे मैदान छोड़कर हट गए।
नबी ﷺ ने 50 सहाबा को उहुद के दर्रे पर तैनात किया था और साफ़ हुक्म दिया था कि किसी हाल में अपनी जगह न छोड़ें। जब शुरू में मुसलमानों को जीत मिली और कुफ्फ़ार भागने लगे, तो ये तीरंदाज़ ग़नीमत समेटने के लिए नीचे उतर गए। इस ग़लती से कुफ्फ़ार ने पीछे से हमला कर दिया और मुसलमानों को भारी नुक़सान हुआ।
इससे दो बातें सामने आती हैं:
यह उन तीरंदाज़ों की बात है जिन्होंने दर्रा छोड़ दिया। उनका इरादा बुरा नहीं था, लेकिन नतीजा बड़ा गंभीर निकला। इस वाक़ये से सबक़ मिलता है कि छोटी ग़लती भी बड़ा असर डाल सकती है।
क्या ही करम वाला एलान है! अल्लाह तआला ने इन नेक सहाबा की ग़लती को माफ़ फ़रमा दिया। अब जो कोई इन पर उंगली उठाए, उसका ईमान से कोई ताल्लुक नहीं।
इस आयत में दो गुटों का ज़िक्र है:
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