Transliteration: (Iz tus'idoona wa laa talwoona 'alaaa ahadinw war Rasoolu yad'ookum feee ukhraakum fa asaabakum ghammam bighammil likailaa tahzanoo 'alaa maa faatakum wa laa maaa asaabakum; wallaahu khabeerum bimaa ta'maloon)
जब ग़ज़वा-ए-उहुद में दुश्मन ने पीछे से हमला किया, तो मुसलमानों में खलबली मच गई और बहुत से लोग डर कर मैदान छोड़कर भाग निकले। यह भागना डर और घबराहट की वजह से था, न कि नफ़ाक या दुश्मनी की वजह से। जबकि नबी ﷺ और कुछ बहादुर सहाबा मैदान में डटे रहे।
इस आयत में अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि रसूल ﷺ तुम्हें बुला रहे थे, जबकि हकीकत में बुलाने वाले उनके सहाबा थे। इससे मालूम हुआ कि रसूल के सहाबा की आवाज़ को रसूल की आवाज़ कहा गया, यानी उनका अमल रसूल ﷺ का अमल समझा गया। यह अहले ईमान के लिए सबक है कि रसूल और उनके सच्चे वारिसों से मदद लेना शरीअत में जायज़ है, बशर्ते वह इबादत का रूप न हो।
तुमने रसूल ﷺ को तकलीफ़ दी, इसलिए अल्लाह ने तुम्हें ग़म पर ग़म दिया। इसमें तीन बातें शामिल हैं:
इस ग़म और हार के बाद, अल्लाह तआला ने यह फ़रमाकर तसल्ली दी कि यह सब तुम्हारी भलाई के लिए था — ताकि तुम न माल-ए-ग़नीमत के छूटने का ग़म करो, न ही ज़ख़्म या शहादत का।
अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया कि उसे तुम्हारे हर अमल और नीयत का इल्म है। मुसलमानों की जो कमज़ोरी हुई, वह दुश्मनी या फितना नहीं, बल्कि इंसानी कमज़ोरी थी, और अल्लाह ने उसे माफ़ भी कर दिया।
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