कुरान - 3:153 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

153
۞إِذۡ تُصۡعِدُونَ وَلَا تَلۡوُۥنَ عَلَىٰٓ أَحَدٖ وَٱلرَّسُولُ يَدۡعُوكُمۡ فِيٓ أُخۡرَىٰكُمۡ فَأَثَٰبَكُمۡ غَمَّۢا بِغَمّٖ لِّكَيۡلَا تَحۡزَنُواْ عَلَىٰ مَا فَاتَكُمۡ وَلَا مَآ أَصَٰبَكُمۡۗ وَٱللَّهُ خَبِيرُۢ بِمَا تَعۡمَلُونَ

Transliteration: (Iz tus'idoona wa laa talwoona 'alaaa ahadinw war Rasoolu yad'ookum feee ukhraakum fa asaabakum ghammam bighammil likailaa tahzanoo 'alaa maa faatakum wa laa maaa asaabakum; wallaahu khabeerum bimaa ta'maloon)

(याद करो) जब तुम भागते जा रहे थे और किसी की तरफ़ पलटकर नहीं देख रहे थे [330], जबकि रसूल (ﷺ) तुम्हें पीछे से पुकार रहे थे [331], तो अल्लाह ने तुम्हें एक ग़म के बदले एक और ग़म दिया [332], ताकि तुम उस चीज़ पर ग़म न करो जो तुमसे छूट गई (जैसे जीत या माल-ए-ग़नीमत), और न उस पर जो तुम पर आई (जैसे ज़ख़्म और शहादत) [333]। और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो [334]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 153 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 153 की तफ़्सीर

 

✅ [330] घबराहट में मैदान छोड़ना

जब ग़ज़वा-ए-उहुद में दुश्मन ने पीछे से हमला किया, तो मुसलमानों में खलबली मच गई और बहुत से लोग डर कर मैदान छोड़कर भाग निकले। यह भागना डर और घबराहट की वजह से था, न कि नफ़ाक या दुश्मनी की वजह से। जबकि नबी ﷺ और कुछ बहादुर सहाबा मैदान में डटे रहे।

✅ [331] रसूल ﷺ की पुकार

इस आयत में अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि रसूल ﷺ तुम्हें बुला रहे थे, जबकि हकीकत में बुलाने वाले उनके सहाबा थे। इससे मालूम हुआ कि रसूल के सहाबा की आवाज़ को रसूल की आवाज़ कहा गया, यानी उनका अमल रसूल ﷺ का अमल समझा गया। यह अहले ईमान के लिए सबक है कि रसूल और उनके सच्चे वारिसों से मदद लेना शरीअत में जायज़ है, बशर्ते वह इबादत का रूप न हो।

✅ [332] एक ग़म के बदले दूसरा ग़म

तुमने रसूल ﷺ को तकलीफ़ दी, इसलिए अल्लाह ने तुम्हें ग़म पर ग़म दिया। इसमें तीन बातें शामिल हैं:

  1. चंद लोगों की गलती की सज़ा पूरी उम्मत को मिल सकती है, जैसे दर्रा छोड़ने वाले तीरंदाज़।
  2. अल्लाह अपने मुकर्रब बंदों को भी उनकी छोटी सी ग़लती पर डाँटता है, जैसे हज़रत आदम (अ.स) को।
  3. दुनियावी सज़ाएँ आखिरत में छुटकारे का ज़रिया बनती हैं, ताकि मोमिन पाक हो जाए।

✅ [333] तसल्ली और राहत का ऐलान

इस ग़म और हार के बाद, अल्लाह तआला ने यह फ़रमाकर तसल्ली दी कि यह सब तुम्हारी भलाई के लिए था — ताकि तुम न माल-ए-ग़नीमत के छूटने का ग़म करो, न ही ज़ख़्म या शहादत का।

✅ [334] अल्लाह को तुम्हारी नीयत का इल्म है

अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया कि उसे तुम्हारे हर अमल और नीयत का इल्म है। मुसलमानों की जो कमज़ोरी हुई, वह दुश्मनी या फितना नहीं, बल्कि इंसानी कमज़ोरी थी, और अल्लाह ने उसे माफ़ भी कर दिया।

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