Transliteration: (Wa laqad sadaqakumul laahu wa'dahooo iz tahussoo nahum bi iznihee hattaaa izaa fashiltum wa tanaaza'tum fil amri wa 'asaitum mim ba'di maaa araakum maa tuhibboon; minkum mai yureedud dunyaa wa minkum mai yureedul Aakhirah; summa sarafakum 'anhum liyabtaliyakum wa laqad 'afaa 'ankum; wallaahu zoo fadlin 'alal mu'mineen)
अल्लाह तआला ने मोमिनों से वादा किया था कि अगर वे ईमान और सब्र पर कायम रहें, तो वे काफ़िरों पर ग़ालिब आएँगे। यह वादा ग़ज़वा-ए-उहुद में शुरू में पूरा हुआ, जब मुसलमानों ने दुश्मनों को मात दी। लेकिन बाद में, लालच और नाफ़रमानी की वजह से वह जीत नाकामी में बदल गई, और यह अल्लाह के वादे का टूटना नहीं था, बल्कि मुसलमानों की अपनी गलती थी।
कमज़ोरी का मतलब था माल-ए-ग़नीमत की तरफ़ झुकना, और झगड़ा उस वक़्त हुआ जब रसूल ﷺ के हुक्म के बावजूद, तैनात साथियों ने पास की पहाड़ी (दर्रा) को छोड़ दिया। यह हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर के हुक्म की अवहेलना थी, जो कि रसूल ﷺ द्वारा नियुक्त किए गए थे।
शुरुआत में काफ़िर मैदान छोड़ कर भाग गए थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि दर्रा ख़ाली है, तो उन्होंने पीछे से हमला किया, और मुसलमानों की स्थिति पलट गई। यह सब एक मामूली नाफ़रमानी के कारण हुआ।
जो दर्रा छोड़कर माल-ए-ग़नीमत की तरफ़ दौड़े, वे दुनिया के तालिब थे। और जो अपने मक़ाम पर डटे रहे और शहीद हो गए, वे आख़िरत के चाहने वाले थे। यहाँ “दुनिया” से मुराद हराम दुनिया नहीं, बल्कि वक़्त से पहले और नाफ़रमानी से हासिल की गई दुनिया है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि इस नाफ़रमानी के बावजूद, उसने तुमको माफ़ कर दिया। इससे मालूम हुआ कि उन सहाबा को बुरा कहने वाला ईमान से ख़ाली है। अल्लाह के द्वारा जिन्हें माफ़ किया गया, उनका कोई अमल हमारे सबसे अच्छे अमल से बेहतर है, क्योंकि हमारी इबादत की कबूलियत यक़ीनी नहीं, लेकिन उनकी माफ़ी अल्लाह के ज़बान से साबित है।
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