कुरान - 3:159 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

159
فَبِمَا رَحۡمَةٖ مِّنَ ٱللَّهِ لِنتَ لَهُمۡۖ وَلَوۡ كُنتَ فَظًّا غَلِيظَ ٱلۡقَلۡبِ لَٱنفَضُّواْ مِنۡ حَوۡلِكَۖ فَٱعۡفُ عَنۡهُمۡ وَٱسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ وَشَاوِرۡهُمۡ فِي ٱلۡأَمۡرِۖ فَإِذَا عَزَمۡتَ فَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُتَوَكِّلِينَ

Transliteration: (Fabimaa rahmatim minal laahi linta lahum wa law kunta fazzan ghaleezal qalbi lanfaddoo min hawlika fa'afu 'anhum wastaghfir lahum wa shaawirhum fil amri fa izaa 'azamta fatawakkal 'alal laah; innallaaha yuhibbul mutawak kileen)

(ऐ महबूब) यह अल्लाह की रहमत है कि आप उनसे नर्म मिज़ाज के साथ पेश आते हैं। अगर आप सख़्त और कठोर दिल वाले होते, तो वे आपके इर्द-गिर्द से बिखर जाते। अतः उन्हें माफ़ कर दें [357], उनके लिए दुआ करें और उनसे सलाह मशविरा करें [358], और जब आप कोई फ़ैसला कर लें, तो अल्लाह पर भरोसा रखें। निःसंदेह, अल्लाह उन लोगों से मुहब्बत करता है जो उस पर भरोसा रखते हैं [359]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 159 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 159 की तफ़्सीर

 

✅ [357] अल्लाह की माफ़ी और रसूल की रहमत

सब तारीफ़ अल्लाह के लिए है कि उसने सहाबा को माफ़ फ़रमाया,
और फिर अपने महबूब नबी ﷺ को भी हुक्म दिया कि

  • उन्हें माफ़ कर दें,
  • उनके लिए दुआ करें,
  • और उन्हें अल्लाह से करीब करने की कोशिश करें।
    यहाँ अल्लाह की रहमत और रसूल ﷺ के अख़्लाक़ की बुलंदी साफ़ नज़र आती है —
    आपकी नर्मी और रहमदिली ने मोमिनों के दिलों को बाँध रखा था।

✅ [358] मशविरा की फ़ज़ीलत और वज़ीरों का दर्जा

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) फ़रमाते हैं कि
यह आयत हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ और हज़रत उमर फारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) के हक़ में नाज़िल हुई,
कि आप ﷺ को उनके साथ मशविरा करना चाहिए।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"अल्लाह ने मुझे अबू बक्र और उमर से सलाह लेने का हुक्म दिया है",
जिससे साबित होता है कि ये दोनों आप ﷺ के वज़ीर की हैसियत रखते थे।
(माख़ूज़: हाकिम; सवािइक मुहर्रिक़ा)

✅ [359] अल्लाह पर भरोसा और मशविरा की अहमियत

इस आयत से दो अहम बातें निकलती हैं:

  • रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत है कि माली, सियासी, और दुनियावी मामलों में मशविरा किया जाए।
  • मशविरा करने और अमल करने से अल्लाह पर तवक्कुल में कोई कमी नहीं आती।
    बल्कि यह खुद अल्लाह का हुक्म है कि इंसान हिकमत और तदबीर के साथ,
    मगर पूरा भरोसा अल्लाह पर रखते हुए काम करे।

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