कुरान - 109:1 सूरह अल-काफ़िरून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
قُلۡ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلۡكَٰفِرُونَ

Transliteration: (Qul yaaa-ayyuhal kaafiroon)

1. कह दीजिए, 'हे काफिरों (disbelievers)' [2]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-काफ़िरून आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

इसका प्रकट होने का पृष्ठभूमि (Background of its Revelation):

कुछ क़ुरैश के लीडर्स पवित्र पैग़ंबर ﷺ के पास आए और कहा, "हमारे धर्म (religion) के कुछ हिस्से को स्वीकार (accept) कर लीजिए, और हम आपके धर्म (religion) के कुछ हिस्से को स्वीकार (accept) कर लेंगे। या फिर एक साल तक आप हमारे मूर्तियों (idols) की पूजा करें और एक साल हम आपके अल्लाह की पूजा करेंगे। इस तरह हम अपने बीच शांति (peace) कायम करेंगे।"

इस पर पवित्र पैग़ंबर ﷺ ने जवाब दिया, "अल्लाह की पनाह (forbid)! मैं कभी भी शिर्क (polytheism) नहीं कर सकता।" यह सुनकर उन्होंने कहा, "क्यों न इज़्ज़त (respect) के तौर पर हमारी मूर्तियों (idols) को चूम लें? अगर आप ऐसा करेंगे, तो हम आपको सच्चा नबी (true Prophet) मान लेंगे।" इस मौके पर यह सूरह उतरी (तफ़सीर खज़ाइनुल इरफान, तफ़सीर ख़ाज़िन, अज़ीज़ी आदि)।

इससे हम यह सीखते हैं कि अविश्वासियों (infidels) के साथ धार्मिक (religious) समझौता करना न केवल पूरी तरह से मना (forbidden) है, बल्कि यह कु्फ्र (infidelity) के बराबर है। इसके अलावा, अविश्वासियों (infidels) के खास दिनों का सम्मान (respect) करना भी कु्फ्र (infidelity) है।

2. यहां उन अविश्वासियों (infidels) की तरफ इशारा है जिन्होंने अल्लाह तआला के ज्ञान (knowledge) के मामले में कु्फ्र (infidelity) किया और जिनके लिए कु्फ्र (infidelity) में मरना लिखा गया, जैसे अबू जहल, आस बिन वाइल, उमय्या बिन खल्फ आदि, जैसा कि आगे के विषय (subject) से साफ़ होता है।

इस सूरह के उतरने के बाद, पवित्र पैग़ंबर ﷺ हरम शरीफ़ गए, जहां अविश्वासियों (infidels) की भीड़ थी। उन्होंने यह ऐलान (proclamation) किया और इस सूरह को पढ़ा, जिससे वे लोग मायूस (disheartened) हो गए। इसके बाद उन्होंने पवित्र पैग़ंबर ﷺ और उनके साथियों पर ज़ुल्म (persecution) करना शुरू कर दिया।

इससे कुछ पॉइंट्स (Points) सामने आते हैं:

  1. एक मोमिन (believer) के दिल में अविश्वासियों (infidels) का कोई डर (fear) नहीं होना चाहिए।
  2. अविश्वासियों (infidels) को बिना धार्मिक (religious) वजह के अच्छे टाइटल्स (titles) से याद नहीं करना चाहिए।
  3. एक अविश्वासी (infidel) को 'अविश्वासी (infidel)' कहना इस्लामी संस्कृति (Islamic culture) है, क्योंकि पवित्र पैग़ंबर ﷺ ने इन बदनसीबों को भाई (brother) या चाचा (uncle) कहकर नहीं बुलाया, बल्कि "हे काफिरों (O infidels)" कहकर बुलाया।

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