कुरान - 109:6 सूरह अल-काफ़िरून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

6
لَكُمۡ دِينُكُمۡ وَلِيَ دِينِ

Transliteration: (Lakum deenukum wa liya deen.)

6.तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है, और मेरे लिए मेरा धर्म है" [7]. (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-काफ़िरून आयत 6 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह का संदेश का व्याख्या ([Explanation of the Surah's Message]):

यह आयत अविश्वासियों के लिए है, और इसमें यह कहा गया है कि कुफ्र ([infidelity]), पाप ([transgression]), बगावत ([rebelliousness]), और नास्तिकता ([faithlessness]) उनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं, जो उनसे अलग नहीं हो सकते, जैसे आग ([fire]) से गर्मी ([heat]) या मल-मूत्र ([excreta]) से गंदगी ([impurity]) अलग नहीं हो सकती। कुफ्र उनके अस्तित्व का एक बुनियादी हिस्सा बन चुका है। वहीं, पैग़ंबर ﷺ का इमान ([faith]), अल्लाह से नज़दीकी ([closeness to Allah]) और धार्मिक ज्ञान ([mystical knowledge]) सूर्य ([sun]) से प्रकाश ([light]) की तरह उनके साथ अभिन्न हैं। ये गुण उनके जीवन का हिस्सा हैं और उन्हें कभी अलग नहीं किया जा सकता।

मुख्य बिंदु ([Key Points]):

अविश्वासियों के लिए कुफ्र की अपरिहार्यता ([Inseparability of Infidelity for the Infidels]):
अविश्वासियों के लिए कुफ्र इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है कि यह आग से गर्मी या मल-मूत्र से गंदगी की तरह उनके साथ जुड़ा हुआ है। वे अविश्वास ([infidelity]) में ही रहेंगे और इसे अलग नहीं किया जा सकता।

पैग़ंबर ﷺ के लिए इमान की अपरिहार्यता ([Inseparability of Faith for the Prophet ﷺ]):
इसके विपरीत, पैग़ंबर ﷺ के लिए उनका इमान ([faith]) और अल्लाह से उनका संबंध सूर्य से प्रकाश की तरह उनसे जुड़े हुए हैं। ये गुण उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा हैं और कभी अलग नहीं हो सकते।

भविष्यवाणी और निश्चितता ([Prophecy and Certainty]):
यह आयत एक भविष्यवाणी ([prophecy]) है जो पैग़ंबर ﷺ के इमान और अविश्वासियों के कुफ्र के बीच के अनिवार्य अंतर ([separation]) को बताती है। यह आयत स्थिर है और बदलने वाली नहीं है, यह दिखाती है कि पैग़ंबर ﷺ का विश्वास और अविश्वासियों का कुफ्र कभी एक नहीं हो सकते।

वैकल्पिक व्याख्या ([Alternative Interpretation]):
इस आयत को एक पूरी तरह से अलगाव की घोषणा ([declaration of separation]) के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसमें पैग़ंबर ﷺ यह कह रहे हैं कि उनका अविश्वासियों से कोई संबंध नहीं है। यह विश्वास और अविश्वास के बीच का स्पष्ट भेद ([divide]) है। इस आयत को बाद में जिहाद ([Jihad]) की आयतों से बदलकर समझा जाता है, क्योंकि कुफ्र ([infidelity]) को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन उसकी शक्ति ([power]) कम हो जाती है।

सोते समय इस आयत का पाठ ([Recitation Before Sleeping]):
यह भी कहा जाता है कि जो इस सूरह का पाठ ([Surah]) सोने से पहले करता है, वह अल्लाह की इच्छा से इमान ([faith]) की हालत में मरेगा।

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