कुरान - 5:53 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

53
وَيَقُولُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَهَـٰٓؤُلَآءِ ٱلَّذِينَ أَقۡسَمُواْ بِٱللَّهِ جَهۡدَ أَيۡمَٰنِهِمۡ إِنَّهُمۡ لَمَعَكُمۡۚ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡ فَأَصۡبَحُواْ خَٰسِرِينَ

Transliteration: (Wa yaqoolul lazeena aamanooo ahaaa'ulaaa'il lazeena aqsamoo billaahi jahda aimaanihim innahum lama'akum; habitat a'maaluhum fa asbahoo khaasireen)

और मोमिन कहेंगे: क्या यही वे लोग हैं जिन्होंने ज़ोर-ज़ोर से अल्लाह की क़सम खाई थी कि वे तुम्हारे साथ हैं? उनके सारे अमल बरबाद हो गए [170], और वे घाटे में पड़ गए। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 53 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 53 की तफ़्सीर

 

✅ [170] निफ़ाक़ की वजह से आमाल का बरबाद हो जाना

उनके सारे अमल बरबाद हो गए — यह आयत इस बात को उजागर करती है कि निफ़ाक़ (मुनाफ़िक़ाना सोच) की वजह से ज़ाहिरी नेकी के काम भी अल्लाह के यहाँ क़ुबूल नहीं होते।
मुनाफ़िक़ अगर नमाज़, रोज़ा, ज़कात, और हज भी अदा करे, तो भी उसके आमाल सच्चे ईमान के बिना बेकार हैं।
यह ऐसा नहीं कि पहले उनके आमाल सही थे और बाद में रद्द हो गए — बल्कि शुरुआत से ही वे बिना ईमान के थे, इसलिए उनका कोई सवाब नहीं।
यह आयत इस बात की भी हिदायत देती है कि मोमिनों को ग़ैर-मुस्लिमों की चाल-ढाल, रस्मों और रवैये की नक़ल नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने अकीदे और अमल में अलग और स्पष्ट रहना चाहिए।

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