Transliteration: (Yaa aiyuhal lazeena aamanoo mai yartadda minkum 'an deenihee fasawfa ya'tillaahu biqawminy yuhibbuhum wa yuhibboonahoo azillatin 'alal mu'mineena a'izzatin 'alal kaafireena yujaahidoona fee sabeelil laahi wa laa yakhaafoona lawmata laaa'im; zaalika fadlul laahi yu'teehi mai yashaaa'; wallaahu Waasi'un 'Aleem)
जो कोई अपने दीन से फिर जाएगा — इस आयत में उन लोगों की तरफ़ इशारा है जो ज़ाहिरी तौर पर ईमान लाते हैं, लेकिन बाद में मुनाफ़िक़ बनकर या खुला कुफ़्र करके दीन छोड़ देते हैं।
यह वाक़िआ हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.अ) के दौर में पेश आया, जब कुछ लोगों ने ज़कात से इनकार किया और कुछ ने झूठे नबियों जैसे मुसैलमा कज्ज़ाब की पैरवी शुरू की।
अल्लाह जल्द ही एक क़ौम को लाएगा — इससे मुराद हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.अ) और उनका वो गिरोह है जिन्होंने इर्तिदाद (दीन से फिरने) के खिलाफ़ क़तलन जिहाद किया और इस्लामी निज़ाम को फिर से क़ायम किया।
यह लोग पहले से मौजूद थे, लेकिन अल्लाह ने उन्हें इस बड़े फ़र्ज़ के लिए इख़्तियार किया।
इस आयत में उस उम्मत की चार ख़ासियतें बयान की गईं हैं:
यह गुण खासतौर पर हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.अ) की सरपरस्ती में चलने वाले मुझाहिदों में देखे गए, जिन्होंने मुनाफ़िक़ों और काफ़िरों दोनों से दीन की हिफ़ाज़त के लिए जंग लड़ी।
यह अल्लाह का फ़ज़्ल है — यानी अल्लाह यह बुलंद मक़ाम जिसे चाहे देता है, लेकिन चुनता उसी को है जो सच्चा ईमान, जज़्बा और इख़लास रखता हो।
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