कुरान - 5:56 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

56
وَمَن يَتَوَلَّ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ فَإِنَّ حِزۡبَ ٱللَّهِ هُمُ ٱلۡغَٰلِبُونَ

Transliteration: (Wa mai yatawallal laaha wa Rasoolahoo wallazeena aamanoo fa inna hizbal laahi humul ghaaliboon)

"और जो कोई अल्लाह को, उसके रसूल को और मोमिनों को अपना दोस्त बनाए, तो बेशक अल्लाह की पार्टी ही ग़ालिब रहने वाली है [176]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 56 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 56 की तफ़्सीर

 

✅ [176] इस आयत से मिलने वाले अहम उसूल

1. नेक बंदों से दोस्ती ईमान की बुनियाद है
जो अल्लाह के सच्चे बंदों — यानी ईमान वालों — से दोस्ती करता है, वह दरअसल अल्लाह से मुहब्बत करता है।

  • ऐसे मोमिनों से दुश्मनी रखना अल्लाह से दुश्मनी के बराबर है।
  • यह आयत मुसलमानों के बीच रूहानी रिश्तों और वफ़ादारी की अहमियत को बयान करती है।

2. मोमिनों के साथ रहना इज़्ज़त और कामयाबी का ज़रिया है

  • एक मुसलमान अगर अपने ईमानी भाईयों के साथ जुड़ा रहता है, तो वह इज़्ज़त, कामयाबी और रूहानी ताक़त हासिल करता है।
  • लेकिन जो शख़्स काफ़िरों की तरह बनना, उनकी सोहबत अपनाना, या उनकी मदद लेना चाहता है, वह ज़िल्लत और नाकामी का शिकार होता है।
  • यह ठीक उसी तरह है जैसे कोई शाख़ पेड़ से अलग हो जाए — वो सूख जाती है। मुसलमान की ताक़त भी उसके अल्लाह, रसूल और ईमानदारी से जुड़े लोगों से ताल्लुक़ में है।

"हिज्बुल्लाह" (अल्लाह की पार्टी) से मुराद वही लोग हैं जो:

  • अल्लाह से वफ़ा रखते हैं,
  • रसूल ﷺ की ताबेदारी करते हैं,
  • और मोमिनों से सच्ची मुहब्बत रखते हैं।
    यही लोग आख़िर में ग़ालिब रहेंगे।

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