कुरान - 5:57 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

57
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَتَّخِذُواْ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ دِينَكُمۡ هُزُوٗا وَلَعِبٗا مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ مِن قَبۡلِكُمۡ وَٱلۡكُفَّارَ أَوۡلِيَآءَۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tattakhizul lazeenat takhazoo deenakum huzuwanw wa la'ibam minal lazeena ootul Kitaaba min qablikum walkuffaara awliyaaa'; wattaqul laaha in kuntum muu'mineen)

"ऐ ईमान वालों! उन लोगों को दोस्त न बनाओ, जो तुम्हारे दीन का मज़ाक़ उड़ाते हैं और उसे खेल तमाशा बनाते हैं — चाहे वो लोग हों जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गई थी [177], या खुले तौर पर काफ़िर हों [178]। और अल्लाह से डरो अगर तुम सच्चे मोमिन हो।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 57 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

:

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 57 की तफ़्सीर

 

✅ [177] इस आयत के नाज़िल होने का कारण

यह आयत रफ़ा'आ इब्न ज़ैद और सुआइद इब्न हारिस के बारे में उतरी, जो ज़बान से इस्लाम का इज़हार करते थे, मगर दिल से मुनाफ़िक और काफ़िर थे।

  • कुछ मुसलमान उनकी दोस्ती में थे, तो अल्लाह ने यह सख़्त वार्निंग नाज़िल की।
  • सबक़:
    • बिना ईमान के कलिमा पढ़ना, इस्लाम का मज़ाक़ उड़ाना है।
    • हर वो शख़्स जो कलिमा पढ़े, ज़रूरी नहीं कि वो सच्चा मुसलमान हो।
    • ऐसे मुनाफ़िक़ों से दोस्ती हराम है।

✅ [178] "काफ़िरों" का मतलब

यहाँ "काफ़िरों" से मुराद सिर्फ आम ग़ैर-मुस्लिम नहीं हैं, क्योंकि "अहले किताब" (यहूद और नसारा) का ज़िक्र पहले ही हो चुका है।

  • बल्कि यहाँ खास तौर पर मशरिकीन और खुले तौर पर इंकार करने वाले लोग मुराद हैं, जो इस्लाम का खुलकर मज़ाक़ उड़ाते हैं।
  • इनसे दोस्ती करना ईमान के ख़िलाफ़ है।

 

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