कुरान - 5:59 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

59
قُلۡ يَـٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ هَلۡ تَنقِمُونَ مِنَّآ إِلَّآ أَنۡ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡنَا وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبۡلُ وَأَنَّ أَكۡثَرَكُمۡ فَٰسِقُونَ

Transliteration: (Qul yaaa Ahlal Kitaabi hal tanqimoona minnaaa illaaa an aamannaa billaahi wa maaa unzila ilainaa wa maa unzila min qablu wa annna aksarakum faasiqoon)

"कह दो: ऐ किताब वालों! तुम हमसे क्या दुश्मनी रखते हो, सिवाय इसके कि हम अल्लाह पर ईमान लाते हैं, और उस पर जो हमारी तरफ़ नाज़िल किया गया, और उस पर भी जो हमसे पहले नाज़िल किया गया? और बेशक, तुममें से बहुत से लोग फ़ासिक़ (नाफ़रमान) हैं [181]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 59 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 59 की तफ़्सीर

 

✅ [181] अहले किताब की दुश्मनी का सबब

इस आयत में अहले किताब (यहूद और नसारा) से मुख़ातिब होकर फ़रमाया गया है कि तुम्हारी दुश्मनी सिर्फ़ इस वजह से है कि मुसलमान अल्लाह, क़ुरआन, और उन तमाम पैग़म्बरों पर ईमान रखते हैं जो पहले भेजे गए थे।

  • मुसलमान ईसा अलैहिस्सलाम, मूसा अलैहिस्सलाम, और बाक़ी सब नबियों पर ईमान रखते हैं।
  • इसके बावजूद यहूद और नसारा मुसलमानों से हसद और दुश्मनी रखते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद ﷺ पर भी ईमान लाया।

ऐतिहासिक संदर्भ:

तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल-'इरफ़ान के मुताबिक़, यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब कुछ यहूदियों ने रसूलुल्लाह ﷺ के पास आकर इस्लाम लाने का इरादा ज़ाहिर किया और पूछा:
"आप किन नबियों पर ईमान लाते हैं?"
जब आपने ﷺ सभी पिछले नबियों और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर ईमान रखने का इज़हार किया, तो उन्होंने इंकार कर दिया। इससे उनकी हठधर्मी और नाफ़रमानी ज़ाहिर होती है।

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