67
۞يَـٰٓأَيُّهَا ٱلرَّسُولُ بَلِّغۡ مَآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ مِن رَّبِّكَۖ وَإِن لَّمۡ تَفۡعَلۡ فَمَا بَلَّغۡتَ رِسَالَتَهُۥۚ وَٱللَّهُ يَعۡصِمُكَ مِنَ ٱلنَّاسِۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡكَٰفِرِينَ
Transliteration: (Yaaa aiyuhar Rasoolu balligh maaa unzila ilaika mir Rabbika wa il lam taf'al famaaa ballaghta Risaalatah; wallaahu ya'simuka minan naas; innal laaha laa yahdil qawmal kaafireen)
"ऐ रसूल! पहुंचा दो वह चीज़ जो तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम पर नाज़िल की गई है। और अगर तुम ऐसा न करोगे, तो तुमने उसका पैग़ाम ही नहीं पहुंचाया [201]। और अल्लाह तुम्हारी लोगों से हिफ़ाज़त करेगा [202]। बेशक अल्लाह काफ़िर लोगों को हिदायत नहीं देता [203]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat