कुरान - 5:65 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

65
وَلَوۡ أَنَّ أَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ ءَامَنُواْ وَٱتَّقَوۡاْ لَكَفَّرۡنَا عَنۡهُمۡ سَيِّـَٔاتِهِمۡ وَلَأَدۡخَلۡنَٰهُمۡ جَنَّـٰتِ ٱلنَّعِيمِ

Transliteration: (Wa law anna Ahlal Kitaabi aamanoo wattaqaw lakaffarnaa 'anhum saiyiaatihim wa la adkhalnaahu Jannaatin Na'eem)

"और अगर अहले किताब ईमान लाते [196] और तक़वा इख़्तियार करते, तो यक़ीनन हम उनसे उनके गुनाह दूर कर देते, और उन्हें नेअमतों वाले बाग़ों (जन्नत) में दाख़िल करते [197]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 65 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 65 की तफ़्सीर

 

✅ [196] "अगर अहले किताब ईमान लाते…"

यहाँ सच्चे ईमान की शर्त है — और वह तब तक पूरा नहीं होता जब तक आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ पर ईमान न लाया जाए।

  • जो शख़्स पिछले तमाम नबियों और किताबों को माने लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ का इंकार करे, वह ईमान वाला नहीं माना जा सकता।
  • इस आयत में "अगर" के लफ़्ज़ से उनकी नाकामी और ज़िद की तरफ़ इशारा है।

✅ [197] गुनाहों की माफ़ी और जन्नत में दाख़िला

अगर वे सच्चे दिल से ईमान लाते और अल्लाह का डर रखते, तो अल्लाह:

  • उनके तमाम पिछले गुनाह माफ़ कर देता
  • और उन्हें जन्नत की नेअमतों में शरीक कर देता।

यह दिखाता है कि इस्लाम में दाख़िल होने से पहले के कुफ़्र के गुनाह भी माफ़ हो सकते हैं, बशर्ते तौबा और ईमान सच्चे हों।

  • लेकिन हुक़ूक़-उल-इबाद (लोगों के हक़) तब तक माफ़ नहीं होंगे जब तक उनकी अदायगी न की जाए।

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