कुरान - 5:63 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

63
لَوۡلَا يَنۡهَىٰهُمُ ٱلرَّبَّـٰنِيُّونَ وَٱلۡأَحۡبَارُ عَن قَوۡلِهِمُ ٱلۡإِثۡمَ وَأَكۡلِهِمُ ٱلسُّحۡتَۚ لَبِئۡسَ مَا كَانُواْ يَصۡنَعُونَ

Transliteration: (Law laa yanhaahumur rabbaaniyyoona wal ahbaaru 'an qawlihimul ismaa wa aklihimus suht; labi'sa maa kaanoo yasna'oon)

"आख़िर क्यों नहीं रोकते उन्हें उनके उलेमा और रहबान गुनाह की बातों से और हराम खाने से? कितना बुरा है जो ये कर रहे हैं।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 63 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 63 की तफ़्सीर

 

✅ [188] दीनदार उलमा की ज़िम्मेदारी

इस आयत में अल्लाह तआला ने यहूदियों के उलेमा और रहबान (पादरियों) की लापरवाही और ख़ामोशी पर ज़ोरदार नक़्द किया है:

  • उनपर फ़र्ज़ था कि वे अपनी क़ौम को गुनाह की बातों से और हराम माल खाने से रोकते, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
  • यह आयत साफ़ करती है कि अगर किसी आलिम के सामने बुराई हो रही हो और वह रोक सकता हो, फिर भी ख़ामोश रहे — तो वह भी उस गुनाह में शरीक माना जाएगा।
  • यह भी साबित होता है कि हक़ की तबलीग करना, बुराई से रोकना, और अख़लाक़ी इस्लाह करना — आलिम की शरई ज़िम्मेदारी है।
  • आख़िर में अल्लाह ने उनके इस अमल को "बुरा" फ़रमाकर यह साफ़ कर दिया कि ख़ामोशी भी एक गुनाह है जब इंसान बुराई के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की क़ुदरत रखता हो।

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