Transliteration: (Laa khaira fee kaseerim min najwaahum illaa man amara bisadaqatin aw ma'roofin aw islaahim bainan naas; wa mai yaf'al zaalikab tighaaa'a mardaatil laahi fa sawfa nu'teehi ajran 'azeemaa)
यह आयत हर तरह की छुपी बातचीत—चाहे वो हुकूमती बैठकों में हो, पार्लियामेंट में, क़बाइली मजलिसों में या घर-परिवार में—सब को शामिल करती है। अगर ये बैठकें सदक़ा, भलाई, या सुलह जैसे नेक मक़सद के लिए हों, तो ये मुबारक और पसंदीदा हैं। वरना ऐसी गुप्त सलाहें आमतौर पर नुक़सानदेह होती हैं और फ़साद का सबब बनती हैं।
इससे मालूम होता है कि अगर कोई मियां-बीवी, बाप-बेटे, रिश्तेदारों, दोस्तों, या यहां तक कि शहरों और कौमों के बीच सुलह की कोशिश करता है, और ये सब कुछ अल्लाह की ख़ुशी के लिए करता है, तो यह एक बड़ी इबादत है। अगर "लोग" से मुराद मुसलमान हैं, तो मतलब है कि उनके आपसी झगड़े सुलझाना। और अगर "लोग" से मुराद तमाम इंसानियत है, तो इसका मतलब होगा कि ग़ैर-मुस्लिमों को इस्लाम की तरफ़ बुलाना, और उनके साथ अमन की कोशिशें करना। अगर किसी जंग के आसार हों और अमन मुसलमानों के हक़ में हो, तो सुलह की पहल की जानी चाहिए। जैसा कि क़ुरआन में है: “अगर वे अमन की तरफ़ झुकें, तो तुम भी झुको और अल्लाह पर भरोसा करो।” (सूरा अल-अन्फाल, 8:61)
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