Transliteration: (Innal laaha laa yaghfiru ai yushraka bihee wayaghfiru maa doona zaalika limai yashaaa'; wa mai yushrik billaahi faqad dalla dalaalam ba'eedaa)
इस आयत में शिर्क से मुराद कुफ़्र है। जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है: "मशरिकों से शादी न करो जब तक वो ईमान न लाएं" (सूरा अल-बक़रा, 2:221)। मतलब यह है कि जो शख़्स शिर्क की हालत में मर जाए, उसे कभी माफ़ नहीं किया जाएगा। लेकिन अगर मौत से पहले तौबा कर ले, तो अल्लाह माफ़ कर देता है। मक्का के बहुत से लोग पहले मुशरिक थे, लेकिन इस्लाम लाने के बाद उनके सब गुनाह माफ़ कर दिए गए।
इससे तीन अहम बातों का पता चलता है:
इसलिए आयत में "जिसे चाहे" कहा गया—ताकि यह समझाया जा सके कि माफ़ी यकीनी नहीं, बल्कि अल्लाह की मरज़ी पर है। यह आयत गुनाह की छूट नहीं देती, बल्कि तौबा और अल्लाह के डर की तरफ़ बुलाती है। अल्लाह की रहमत से मायूसी भी गुनाह है, और उसकी रहमत से उम्मीद रखना इंसान को तौबा और नेकियों की तरफ़ ले जाता है।
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