Transliteration: (man kaana yureedu sawaabad dunyaa fa'indallaahi sawaabud dunyaa wal Aakhirah; wa kaanal laahu Samee'am Baseeraa)
चूँकि दुनिया और आख़िरत दोनों का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है, इसलिए इंसान को चाहिए कि वह दोनों की भलाई उसी से माँगे। लेकिन माँगने वाले में ख़लूस और समझदारी भी होनी चाहिए।
इससे दो अहम बातें मालूम होती हैं:
अगर किसी की इबादत की नीयत ये हो कि:
तो ऐसी इबादत जायज़ और पसंदीदा है। जैसे कि सलातुल कुसूफ़ और सलातुल खसूफ़ (सूरज और चाँद के गहनों के वक़्त पढ़ी जाने वाली नमाज़ें), जिनका मक़सद आसमानी नुक़सान से अल्लाह की पनाह लेना होता है। इससे साबित होता है कि दुनियावी वजहें, अगर ईमान और नीयत के साथ हों, तो इबादत के लिए दुरुस्त वजह हो सकती हैं।
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