Transliteration: (Yaa aiyuhal lazeena aamanoo koonoo qawwa ameena bilqisti shuhadaaa'a lillaahi wa law 'alaa anfusikum awil waalidaini wal aqrabeen iny yakun ghaniyyan aw faqeeran fallaahu awlaa bihimaa falaaa tattabi'ul hawaaa an ta'diloo; wa in talwooo aw tu'ridoo fa innal laaha kaana bimaa ta'maloona Khabeera)
यह आयत हाकिमों, क़ाज़ियों, गवाहों, उलमा, परहेज़गारों और आम मोमिनों से मुख़ातिब है। हर शख़्स को अपनी हैसियत के मुताबिक़ इंसाफ़ पर क़ायम रहने का हुक्म है। “मज़बूती से खड़े रहो” का मतलब है कि मुसलमान की हर बात, हर फ़ैसला, और हर अमल इंसाफ़ और सच्चाई पर आधारित होना चाहिए। यहाँ तक कि:
इस हिस्से से कई अहम उसूल मालूम होते हैं:
माँ-बाप की सेवा और रिश्तेदारों से हुस्ने सुलूक बेशक नेक अमल है, लेकिन फ़ैसलों में झुकाव या पक्षपात हराम है।
अमीरों का रौब, या ग़रीबों की हालत — दोनों इंसाफ़ को प्रभावित न करें।
किसी को बचाने के लिए झूठ बोलना, या शरीअत की ग़लत तावील करना — यह सब संगीन गुनाह हैं।
इंसाफ़ रहमत से बड़ा है, क्योंकि इंसाफ़ हर किसी का हक़ अदा करता है, जबकि रहमत कभी-कभी चयनात्मक हो सकती है।
अल्लाह का हक़, हर रिश्ते और हर भावना से ऊपर है — और उसे हर हाल में अदा किया जाना चाहिए।
इसका ताल्लुक़ न्याय को बिगाड़ने या शरई हुक्मों को तोड़मरोड़ कर पेश करने से है। जैसे कि:
आख़िर में आयत यह ताक़ीद करती है कि अल्लाह तुम्हारे हर छुपे और खुले अमल से वाक़िफ़ है।
इसलिए इंसाफ़ सिर्फ़ अल्लाह के लिए, बिना किसी डर या झुकाव के, पूरी इख़लास और बेबाकी से किया जाना चाहिए।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat