कुरान - 4:135 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

135
۞يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُونُواْ قَوَّـٰمِينَ بِٱلۡقِسۡطِ شُهَدَآءَ لِلَّهِ وَلَوۡ عَلَىٰٓ أَنفُسِكُمۡ أَوِ ٱلۡوَٰلِدَيۡنِ وَٱلۡأَقۡرَبِينَۚ إِن يَكُنۡ غَنِيًّا أَوۡ فَقِيرٗا فَٱللَّهُ أَوۡلَىٰ بِهِمَاۖ فَلَا تَتَّبِعُواْ ٱلۡهَوَىٰٓ أَن تَعۡدِلُواْۚ وَإِن تَلۡوُۥٓاْ أَوۡ تُعۡرِضُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرٗا

Transliteration: (Yaa aiyuhal lazeena aamanoo koonoo qawwa ameena bilqisti shuhadaaa'a lillaahi wa law 'alaa anfusikum awil waalidaini wal aqrabeen iny yakun ghaniyyan aw faqeeran fallaahu awlaa bihimaa falaaa tattabi'ul hawaaa an ta'diloo; wa in talwooo aw tu'ridoo fa innal laaha kaana bimaa ta'maloona Khabeera)

ऐ ईमान वालों! तुम न्याय के लिए मज़बूती से खड़े रहो [401], अल्लाह के लिए गवाही दो, चाहे वह ख़ुद तुम्हारे अपने ही ख़िलाफ़ क्यों न हो, या तुम्हारे माँ-बाप और रिश्तेदारों के ख़िलाफ़। चाहे वह अमीर हो या ग़रीब, अल्लाह दोनों का ज़्यादा हक़दार है [402]। इसलिए अपनी इच्छाओं का पीछा न करो, ताकि न्याय से भटक न जाओ। और अगर तुम बात को मरोड़ो [403] या मुँह फेर लो, तो अल्लाह तुम्हारे सब कामों से बाख़बर है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 135 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 135 की तफ़्सीर

 

✅ [401] न्याय के लिए मज़बूती से खड़े रहना फ़र्ज़ है

यह आयत हाकिमों, क़ाज़ियों, गवाहों, उलमा, परहेज़गारों और आम मोमिनों से मुख़ातिब है। हर शख़्स को अपनी हैसियत के मुताबिक़ इंसाफ़ पर क़ायम रहने का हुक्म है। “मज़बूती से खड़े रहो” का मतलब है कि मुसलमान की हर बात, हर फ़ैसला, और हर अमल इंसाफ़ और सच्चाई पर आधारित होना चाहिए। यहाँ तक कि:

  • अपनी ग़लती मानना,
  • कमज़ोरी स्वीकार करना,
  • और अपने ही ख़िलाफ़ फ़ैसला देना — यही इस्लामी न्याय की असल रूह है।

✅ [402] फ़ैसलों में कोई पक्षपात न हो — चाहे अपना हो या पराया

इस हिस्से से कई अहम उसूल मालूम होते हैं:
माँ-बाप की सेवा और रिश्तेदारों से हुस्ने सुलूक बेशक नेक अमल है, लेकिन फ़ैसलों में झुकाव या पक्षपात हराम है।

अमीरों का रौब, या ग़रीबों की हालत — दोनों इंसाफ़ को प्रभावित न करें।
किसी को बचाने के लिए झूठ बोलना, या शरीअत की ग़लत तावील करना — यह सब संगीन गुनाह हैं।

इंसाफ़ रहमत से बड़ा है, क्योंकि इंसाफ़ हर किसी का हक़ अदा करता है, जबकि रहमत कभी-कभी चयनात्मक हो सकती है।

अल्लाह का हक़, हर रिश्ते और हर भावना से ऊपर है — और उसे हर हाल में अदा किया जाना चाहिए।

✅ [403] मक्कारी और ग़लतबयानी से सख़्त मना है

इसका ताल्लुक़ न्याय को बिगाड़ने या शरई हुक्मों को तोड़मरोड़ कर पेश करने से है। जैसे कि:

  • वकील का झूठे सबूत से मुजरिम को बचाना,
  • हाकिम का दबाव में आकर ग़लत फ़ैसला देना,
  • या उलमा का नाफ़रमानी को जायज़ साबित करना — ये तमाम काम अल्लाह की नज़र में नापसंद और ग़लत हैं।

आख़िर में आयत यह ताक़ीद करती है कि अल्लाह तुम्हारे हर छुपे और खुले अमल से वाक़िफ़ है।
इसलिए इंसाफ़ सिर्फ़ अल्लाह के लिए, बिना किसी डर या झुकाव के, पूरी इख़लास और बेबाकी से किया जाना चाहिए।

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