Transliteration: (Innal lazeena aamanoo summa kafaroo summa aamanoo summa kafaroo summaz daado kufral lam yakunil laahu liyaghfira lahum wa laa liyahdiyahum sabeelaa)
"फिर अपने कुफ़्र में बढ़ते चले गए" — इसका मतलब है कि आख़िरकार वह शख़्स कुफ़्र की हालत में ही मर गया, और यही वह हालत है जिसे अल्लाह कभी माफ़ नहीं करता।
अगर कोई इंसान आख़िरी वक़्त में सच्चे दिल से ईमान लेकर मरता है, तो अल्लाह उसके पहले के तमाम गुनाह, यहाँ तक कि कई बार इस्लाम से फिरना (इर्तिदाद) भी माफ़ कर सकता है।
मगर इस आयत में जिस पर लानत की गई है, वह वह व्यक्ति है जो बार-बार ईमान लाकर फिर छोड़ देता है, और आख़िरकार कुफ़्र में डूब कर मरता है।
शरीअत के लिहाज़ से बार-बार इस्लाम से फिरना, और उसकी वापसी सच्चे दिल से न हो, तो ऐसा व्यक्ति कभी भी भरोसे के क़ाबिल नहीं रहता। ख़ास तौर पर जब उसका ईमान राजनीतिक मकसद या दुनियावी फ़ायदे के लिए हो।
इस आयत से यह हिदायत मिलती है कि जो बार-बार इस्लाम लाए और फिर छोड़ दे, उसका ईमान शरीअत में क़ाबिल-ए-एतमाद नहीं रहता।
ख़ासकर जंग या टकराव की स्थिति में, जब कोई दुश्मन सिर्फ जान बचाने के लिए या चालाकी से ईमान का इज़हार करे, तो उसका ईमान क़बूल नहीं किया जाता।
दुर्रे मुख़्तार (हanaf़ी फिक्ह की एक महत्वपूर्ण किताब) के अनुसार, ऐसे धोखेबाज़ लोगों का ईमान शक के दायरे में आता है।
क्योंकि अल्लाह फ़रमाता है:
"कहो: जब क़यामत का दिन आएगा, तब कुफ़्फ़ार का ईमान लाना उन्हें कोई फ़ायदा नहीं देगा, और न ही उन्हें मोहलत दी जाएगी।"
(सूरा अस-सजदा, 32:29)
यह इस बात की चेतावनी है कि सिर्फ जुबान से ईमान लाना, अगर सच्चे दिल से न हो, तो अल्लाह के नज़दीक वो क़ाबिल-ए-क़ुबूल नहीं।
इसलिए ईमान का सही होना, उसकी सच्चाई, स्थायित्व और दिली यक़ीन पर निर्भर करता है — न कि बार-बार बदलते हुए चालाक रवैये पर।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat