कुरान - 4:139 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

139
ٱلَّذِينَ يَتَّخِذُونَ ٱلۡكَٰفِرِينَ أَوۡلِيَآءَ مِن دُونِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَۚ أَيَبۡتَغُونَ عِندَهُمُ ٱلۡعِزَّةَ فَإِنَّ ٱلۡعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعٗا

Transliteration: (Allazeena yattakhizoo nal kaafireena awliyaaa'a min doonil mu'mineen; a-yabta ghoona 'indahumul 'izzata fainnnal 'izzata lillaahi jamee'aa)

जो लोग मोमिनों को छोड़कर काफ़िरों को अपना दोस्त बनाते हैं — क्या वे उनसे इज़्ज़त हासिल करना चाहते हैं? यक़ीनन सारी इज़्ज़त अल्लाह ही के लिए है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 139 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 139 की तफ़्सीर

 

✅ [411] ईमान वालों की जगह काफ़िरों से दोस्ती – मुनाफ़िक़त की पहचान

जो लोग मुसलमानों को छोड़कर काफ़िरों से दोस्ती करते हैं, उनका यह रवैया मुनाफ़िक़ों की निशानी माना गया है।
ख़ासतौर से जब यह दोस्ती मुसलमानों के मुक़ाबले में हो, यानी काफ़िरों के साथ गठजोड़ मुसलमानों की मुख़ालफ़त के लिए किया जाए।
ऐसे लोग दीन के साथ बेवफ़ाई करते हैं और अपने आपको अल्लाह की रहमत और माफ़ी से दूर कर लेते हैं।

✅ [412] इज़्ज़त का असली स्रोत — सिर्फ़ अल्लाह

क्या ये लोग काफ़िरों से इज़्ज़त और ताक़त चाहते हैं?
यह सोच धोखा है, क्योंकि असल इज़्ज़त और हुकूमत अल्लाह के हाथ में है।
जो अपने दीन पर सच्चाई और मजबूती से क़ायम रहते हैं, वही अल्लाह के नज़दीक मुअज्ज़िज़ होते हैं।
जो लोग दीन में समझौता करते हैं, या दीन के नाम पर बेवफ़ाई करते हैं, वो न अपनों में इज़्ज़त पाते हैं, न ग़ैरों में।
इसी तरह, वह आलिम जो दुनियावी फ़ायदे के लिए सच्चाई से समझौता करता है, वह भी इज़्ज़त खो बैठता है।
इज़्ज़त अल्लाह की है, और वह अपने रसूल ﷺ और उनके उम्मतीों को अपने फ़ज़्ल से अता करता है।

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