Transliteration: (Allazeena yatarab basoona bikum fa in kaana lakum fathum minal laahi qaalooo alam nakum ma'akum wa in kaana lilkaafireena naseebun qaalooo alam nastah wiz 'alaikum wa nammna'kum minal mu'mineen; fallaahu yahkumu bainakum Yawmal Qiyaamah; wa lai yaj'alal laahu lilkaafireena 'alal mu'mineena sabeelaa)
यह आयत उन मुनाफ़िक़ों के रवैये को उजागर करती है जो
जुबान से कलिमा पढ़ते हैं, नमाज़ भी पढ़ते हैं, यहाँ तक कि जंग में भी शामिल होते हैं,
मगर इनका मक़सद सिर्फ़ जीत में हिस्सा और माली फ़ायदा उठाना होता है।
अगर मुसलमानों को फतह मिल जाए, तो ये कहते हैं:
"क्या हम तुम्हारे साथ नहीं थे?"
ताकि लूट या इनाम में हिस्सा ले सकें, मगर दिल से इनका ईमान से कोई ताल्लुक़ नहीं होता।
इससे यह सीख मिलती है कि:
अगर काफ़िरों को कहीं फ़ायदा मिल जाए, तो यही मुनाफ़िक़ उनसे कहते हैं:
"क्या हमने तुम्हें मोमिनों से नहीं बचाया?"
यानी —
दुनिया में ये मुनाफ़िक़ दोनों तरफ़ की ज़ुबान बोलते हैं,
मगर क़ियामत के दिन अल्लाह साफ़ फ़ैसला करेगा:
अल्लाह कभी काफ़िरों को मोमिनों पर मुकम्मल ग़ालिब नहीं होने देगा,
मगर बशर्ते कि मोमिन ख़ुद अपने दीन से ग़द्दारी न करें।
अगर मुसलमान ज़ुल्म, गुनाह और नाफ़रमानी में पड़ जाएं,
तब अल्लाह उन पर काफ़िरों को मुसल्लत कर देता है — मगर यह उनकी अपनी कमी की वजह से होता है।
इस आयत से कुछ शरीअत के उसूल भी निकलते हैं:
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