कुरान - 4:141 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

141
ٱلَّذِينَ يَتَرَبَّصُونَ بِكُمۡ فَإِن كَانَ لَكُمۡ فَتۡحٞ مِّنَ ٱللَّهِ قَالُوٓاْ أَلَمۡ نَكُن مَّعَكُمۡ وَإِن كَانَ لِلۡكَٰفِرِينَ نَصِيبٞ قَالُوٓاْ أَلَمۡ نَسۡتَحۡوِذۡ عَلَيۡكُمۡ وَنَمۡنَعۡكُم مِّنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَۚ فَٱللَّهُ يَحۡكُمُ بَيۡنَكُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۚ وَلَن يَجۡعَلَ ٱللَّهُ لِلۡكَٰفِرِينَ عَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ سَبِيلًا

Transliteration: (Allazeena yatarab basoona bikum fa in kaana lakum fathum minal laahi qaalooo alam nakum ma'akum wa in kaana lilkaafireena naseebun qaalooo alam nastah wiz 'alaikum wa nammna'kum minal mu'mineen; fallaahu yahkumu bainakum Yawmal Qiyaamah; wa lai yaj'alal laahu lilkaafireena 'alal mu'mineena sabeelaa)

(वो मुनाफ़िक़) जो तुम्हारे बारे में ताक में रहते हैं — फिर अगर अल्लाह की तरफ़ से तुम्हें फ़तह मिलती है तो कहते हैं: "क्या हम तुम्हारे साथ नहीं थे?" [416] और अगर काफ़िरों को कोई हिस्सा मिल जाए, तो उनसे कहते हैं: "क्या हम तुम पर ग़ालिब नहीं रहे और तुम्हें मोमिनों से बचाए रखा नहीं?" [417] — तो अल्लाह क़ियामत के दिन तुम्हारे दरमियान फ़ैसला करेगा [418], और अल्लाह काफ़िरों को मोमिनों पर कभी ग़ालिब होने का रास्ता नहीं देगा [419]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 141 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 141 की तफ़्सीर

 

✅ [416] मुनाफ़िक़ों की दोहरी चाल — ईमान का ढोंग, फ़ायदे की नीयत

यह आयत उन मुनाफ़िक़ों के रवैये को उजागर करती है जो
जुबान से कलिमा पढ़ते हैं, नमाज़ भी पढ़ते हैं, यहाँ तक कि जंग में भी शामिल होते हैं,
मगर इनका मक़सद सिर्फ़ जीत में हिस्सा और माली फ़ायदा उठाना होता है।
अगर मुसलमानों को फतह मिल जाए, तो ये कहते हैं:
"क्या हम तुम्हारे साथ नहीं थे?"
ताकि लूट या इनाम में हिस्सा ले सकें, मगर दिल से इनका ईमान से कोई ताल्लुक़ नहीं होता।
इससे यह सीख मिलती है कि:

  • सिर्फ जुबान और जिस्म से मुसलमान बनने का दावा काफ़ी नहीं।
  • सच्चा ईमान दिल से, यक़ीन और वफ़ादारी के साथ होता है।

✅ [417] काफ़िरों से गुप्त वफ़ादारी — मुनाफ़िक़ों की असलियत

अगर काफ़िरों को कहीं फ़ायदा मिल जाए, तो यही मुनाफ़िक़ उनसे कहते हैं:
"क्या हमने तुम्हें मोमिनों से नहीं बचाया?"
यानी —

  • हमने तुम्हारे ख़िलाफ़ नहीं लड़ा,
  • हमने मुसलमानों की तादाद को कमज़ोर किया,
  • हमने तुम्हारे लिए जासूसी की या अंदरूनी राज बताए।
    इससे यह हिदायत मिलती है कि:
  • जो मुसलमान, काफ़िरों के लिए जासूसी या दलाली करता है,
  • जो उम्मत की तबाही के लिए दुश्मनों की मदद करता है,
    — वह मुनाफ़िक़ों जैसा ही है।
    दुनियावी फ़ायदे के लिए दीन और उम्मत से बेवफ़ाई करना, इस आयत के अनुसार,
    सबसे ग़लीज़ मुनाफ़िक़त में से है।

✅ [418] आख़िरत में फ़ैसला सिर्फ़ अल्लाह करेगा

दुनिया में ये मुनाफ़िक़ दोनों तरफ़ की ज़ुबान बोलते हैं,
मगर क़ियामत के दिन अल्लाह साफ़ फ़ैसला करेगा:

  • हर शख़्स उसके साथ खड़ा होगा जिससे वह दिल से मोहब्बत करता था।
  • मुनाफ़िक़त का पर्दा उठ जाएगा, और सच्चाई सामने आ जाएगी।
    यह आयत बताती है कि दुनियावी चालाकियाँ आख़िरत में काम नहीं आएंगी।

✅ [419] असली ताक़त और ग़ल्बा अल्लाह ही के हाथ में है

अल्लाह कभी काफ़िरों को मोमिनों पर मुकम्मल ग़ालिब नहीं होने देगा,
मगर बशर्ते कि मोमिन ख़ुद अपने दीन से ग़द्दारी न करें।
अगर मुसलमान ज़ुल्म, गुनाह और नाफ़रमानी में पड़ जाएं,
तब अल्लाह उन पर काफ़िरों को मुसल्लत कर देता है — मगर यह उनकी अपनी कमी की वजह से होता है।
इस आयत से कुछ शरीअत के उसूल भी निकलते हैं:

  • काफ़िर, मुसलमान ग़ुलाम को ख़रीद नहीं सकता।
  • काफ़िर, मुसलमान से विरासत नहीं ले सकता और न दे सकता।
    असल इज़्ज़त और ताक़त सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है, और वह अपनी रहमत से इसे सिर्फ़ मोमिनों को अता करता है।

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