कुरान - 4:142 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

142
إِنَّ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ يُخَٰدِعُونَ ٱللَّهَ وَهُوَ خَٰدِعُهُمۡ وَإِذَا قَامُوٓاْ إِلَى ٱلصَّلَوٰةِ قَامُواْ كُسَالَىٰ يُرَآءُونَ ٱلنَّاسَ وَلَا يَذۡكُرُونَ ٱللَّهَ إِلَّا قَلِيلٗا

Transliteration: (Innal munaafiqeena yukhaadi'oonal laaha wa huwa khaadi'uhum wa izaa qaamooo ilas Salaati qaamoo kusaalaa yuraaa'oonan naasa wa laa yazkuroonal laaha illaa qaleelaa)

बेशक मुनाफ़िक़ लोग अल्लाह को धोखा देने की कोशिश करते हैं [420], हालाँकि वही उनको धोखा दे रहा है। और जब वे नमाज़ के लिए खड़े होते हैं, तो काहिली और थकावट के साथ खड़े होते हैं [421] — लोगों को दिखाने के लिए, और अल्लाह को बहुत कम याद करते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 142 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 142 की तफ़्सीर

 

✅ [420] रसूल ﷺ को धोखा देना — दरअस्ल अल्लाह को धोखा देना

इससे यह बात साबित होती है कि:

  • जो शख़्स रसूल ﷺ या मुसलमानों को धोखा देता है,
  • या इस्लामी समाज में फरेब और चालाकी से शामिल होता है,
    — वह वास्तव में अल्लाह को धोखा देने की कोशिश करता है।
    मुनाफ़िक़ अपने दिल का कुफ़्र छुपाकर, जुबान से ईमान का दिखावा करते थे,
    ताकि मुसलमानों में शामिल रहकर फ़ायदे उठा सकें,
    लेकिन अल्लाह उनके मक्र को उन्हीं पर पलट देता है।
    असल में वे खुद को धोखा दे रहे होते हैं, क्योंकि अल्लाह सब जानता है।

✅ [421] नमाज़ में सुस्ती — मुनाफ़िक़ की पहचान

इस आयत में सुस्त, बेजान और बेमन से नमाज़ पढ़ना — मुनाफ़िक़त की खुली निशानी बताया गया है।
ऐसे उदाहरणों में शामिल हैं:

  • बिना वजह मस्जिद से दूर रहना,
  • जमाअत की नमाज़ छोड़ना,
  • जान-बूझकर देर से पहुँचना,
  • बिना शरीफाना लिबास (जैसे कुरता या टोपी) के आना,
  • नमाज़ में ढीला रवैया, ध्यान न देना,
  • रुक्न और सजदा सही तरीके से न करना।

ऐसे लोग नमाज़ सिर्फ़ लोगों को दिखाने के लिए पढ़ते हैं,
उनके दिल में अल्लाह की याद बहुत कम होती है,
और उनकी इबादत में इख़लास (सच्चाई) और तवाज़ुन (ध्यान) का अभाव होता है।

यह आयत हमें ताक़ीद करती है कि:

  • नमाज़ में दिल से हाज़िरी और नीयत की पवित्रता ज़रूरी है।
  • सिर्फ़ रस्म अदायगी नहीं, बल्कि इबादत में रुहानी तवज्जोह होनी चाहिए।
  • सच्चा मोमिन नमाज़ को बोझ नहीं, बल्कि सुकून और अल्लाह से मुलाक़ात समझता है।

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