Transliteration: (Innal lazeena yakkfuroona billaahi wa Rusulihee wa yureedoona ai yufarriqoo bainal laahi wa Rusulihee wa yaqooloona nu'minu biba'dinw wa nakfuru biba' dinw wa yureedoona ai yattakhizoo baina zaalika sabeelaa)
इस आयत में उन लोगों की निंदा की गई है जो अल्लाह पर तो ईमान का दावा करते हैं, लेकिन उसके रसूल को नहीं मानते, या कुछ रसूलों को मानते हैं और कुछ को नहीं। यह कोशिश करना कि ईमान और कुफ़्र के बीच कोई बीच का रास्ता निकाल लिया जाए, दरअसल कुफ़्र की असल सूरत है।
इससे यह हक़ीक़त सामने आती है कि सच्चा ईमान वही है जिसमें अल्लाह और उसके तमाम रसूलों पर मुकम्मल यक़ीन हो — बिना किसी तफ़रीक या बँटवारे के। रसूल ﷺ को अल्लाह से अलग मानना, चाहे दर्जे में हो या मान्यता में, सिर्फ़ अधूरा ईमान नहीं, बल्कि पूरा कुफ़्र है।
इस रिश्ते को एक ख़ूबसूरत मिसाल से समझाया गया है:
जैसे दीपक की रौशनी शीशे में पूरी तरह समा जाती है, या
जैसे पानी के अंदर रोशनाई मिल जाए,
उसी तरह तौहीद और रिसालत का रिश्ता जुदा नहीं किया जा सकता।
कलिमा तैय्यिबा भी इसी हक़ीक़त का इज़हार करता है:
इस आयत के ज़रिए कुरआन उन लोगों का रद्द करता है जो कहते हैं कि "हम कुछ रसूलों को मानते हैं और कुछ को नहीं" — क्योंकि आधा ईमान, असल में कोई ईमान नहीं होता।
पूरा और सच्चा ईमान वही है जो तमाम रसूलों को एक ही हक़ीक़त का हिस्सा माने, और इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ को अल्लाह का आख़िरी और सबसे मुकम्मल रसूल माने।
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