कुरान - 4:150 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

150
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡفُرُونَ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيُرِيدُونَ أَن يُفَرِّقُواْ بَيۡنَ ٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيَقُولُونَ نُؤۡمِنُ بِبَعۡضٖ وَنَكۡفُرُ بِبَعۡضٖ وَيُرِيدُونَ أَن يَتَّخِذُواْ بَيۡنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا

Transliteration: (Innal lazeena yakkfuroona billaahi wa Rusulihee wa yureedoona ai yufarriqoo bainal laahi wa Rusulihee wa yaqooloona nu'minu biba'dinw wa nakfuru biba' dinw wa yureedoona ai yattakhizoo baina zaalika sabeelaa)

जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करते हैं, और अल्लाह और उसके रसूलों के बीच फ़र्क़ डालना चाहते हैं [434], और कहते हैं: हम कुछ पर ईमान लाते हैं और कुछ का इनकार करते हैं, और इस तरह ईमान और कुफ़्र के बीच एक रास्ता निकालना चाहते हैं... (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 150 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 150 की तफ़्सीर

 

✅ [434] अल्लाह और उसके रसूल को अलग करना — कुफ़्र का असल

इस आयत में उन लोगों की निंदा की गई है जो अल्लाह पर तो ईमान का दावा करते हैं, लेकिन उसके रसूल को नहीं मानते, या कुछ रसूलों को मानते हैं और कुछ को नहीं। यह कोशिश करना कि ईमान और कुफ़्र के बीच कोई बीच का रास्ता निकाल लिया जाए, दरअसल कुफ़्र की असल सूरत है।

इससे यह हक़ीक़त सामने आती है कि सच्चा ईमान वही है जिसमें अल्लाह और उसके तमाम रसूलों पर मुकम्मल यक़ीन हो — बिना किसी तफ़रीक या बँटवारे के। रसूल ﷺ को अल्लाह से अलग मानना, चाहे दर्जे में हो या मान्यता में, सिर्फ़ अधूरा ईमान नहीं, बल्कि पूरा कुफ़्र है।

इस रिश्ते को एक ख़ूबसूरत मिसाल से समझाया गया है:
जैसे दीपक की रौशनी शीशे में पूरी तरह समा जाती है, या
जैसे पानी के अंदर रोशनाई मिल जाए,
उसी तरह तौहीद और रिसालत का रिश्ता जुदा नहीं किया जा सकता।

कलिमा तैय्यिबा भी इसी हक़ीक़त का इज़हार करता है:

  • पहले हिस्से में अल्लाह का नाम आख़िर में आता है – ला इलाहा इल्लल्लाह,
  • और दूसरे हिस्से में रसूल ﷺ का नाम पहले आता है – मुहम्मदुर रसूलुल्लाह,
    जिससे साबित होता है कि अल्लाह और उसके रसूल के बीच कोई जुदाई नहीं, बल्कि दोनों पर यक़ीन एक साथ, मुकम्मल और बिना शर्त होना चाहिए।

इस आयत के ज़रिए कुरआन उन लोगों का रद्द करता है जो कहते हैं कि "हम कुछ रसूलों को मानते हैं और कुछ को नहीं" — क्योंकि आधा ईमान, असल में कोई ईमान नहीं होता।
पूरा और सच्चा ईमान वही है जो तमाम रसूलों को एक ही हक़ीक़त का हिस्सा माने, और इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ को अल्लाह का आख़िरी और सबसे मुकम्मल रसूल माने।

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