अल्लाह नापसंद करता है कि कोई बुरी बात ज़ाहिर करे [430], सिवाय उस व्यक्ति के जो ज़ुल्म का शिकार हो [431]। और अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, जानने वाला है [432]।
इस आयत का पहला हिस्सा यह बताता है कि किसी की बुराई को ज़ाहिर करना, या बुरा बोलना, अल्लाह को नापसंद है। इसमें शामिल हैं: ग़ीबत करना, बोहतान लगाना, झूठ बोलना, लानत-मलामत करना, या किसी के गुनाहों को उजागर करना, चाहे वे अपने हों या दूसरों के। यह सब बुरा कलाम है, और अल्लाह के नज़दीक गुनाह है, चाहे वह बात सही ही क्यों न हो, अगर उसका ज़ाहिर करना नुकसानदेह या शर्मिंदगी का सबब बने।
हां, एक मज़लूम इंसान को इजाज़त है कि वह अपने ऊपर किए गए ज़ुल्म को ज़ाहिर करे, ताकि इंसाफ़ मिल सके। इसमें यह भी शामिल है: हाकिम या क़ाज़ी से शिकायत करना, किसी चोर, फ़रेबी या गद्दार को उजागर करना, या हदीस की जांच या अदालत में गवाही के लिए किसी की गलत बात का खुलासा करना। ऐसे मौक़ों पर सच बोलना, भले ही बुरा हो, ग़ीबत नहीं कहलाता। इससे हमें यह सीख मिलती है कि न्याय के लिए ज़ुल्म का ज़िक्र करना जायज़ है, लेकिन हद से बढ़कर, बदले की भावना से बोलना, या बदनीयती से बुराई फैलाना अब भी नाजायज़ है।
इस आयत के आखिर में यह तस्सली दी गई है कि अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है। आयत के नुज़ूल का सबब यह था कि हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु पर एक आदमी बार-बार ताना मार रहा था, लेकिन आपने खामोशी इख़्तियार की। जब आपने जवाब दिया, तो रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: जब तुम खामोश थे, एक फ़रिश्ता तुम्हारी तरफ़ से जवाब दे रहा था, लेकिन जब तुमने बोलना शुरू किया, तो वह फ़रिश्ता चला गया। इसके बाद यह आयत नाज़िल हुई।
इससे मालूम हुआ कि बदला लेना जायज़ है, ख़ासकर जब ज़ुल्म किया गया हो, मगर सबर और माफ़ कर देना अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा अफ़ज़ल है।
ऐ अल्लाह! हमें सब्र, इख़लास और इंसाफ़ से बोलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। आमीन।
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सूरह अन-निसा आयत 148 तफ़सीर