Transliteration: (Illal lazeena taaboo wa aslahoo wa'tasamoo billaahi wa akhlasoo deenahum lillaahi faulaaa'ika ma'al mu'mineena wa sawfa yu'til laahul mu'mineena ajran 'azeemaa)
यह उन लोगों की बात है जो मुनाफ़िक़त या कुफ़्र से तौबा करते हैं और अपने आमाल को सही कर लेते हैं। इससे यह हिदायत मिलती है कि चाहे कोई कितना ही बड़ा गुनहगार क्यों न हो, अगर वह सच्चे दिल से तौबा करता है, तो अल्लाह उसकी तौबा क़ुबूल करता है। मगर तौबा सिर्फ़ ज़ुबान से अल्फ़ाज़ बोल देने का नाम नहीं, बल्कि असल तौबा वह होती है जिसमें इंसान अपने गुनाहों से पूरी तरह मुंह मोड़ ले और आज्ञाकारिता की राह अपनाए। अगर आमाल में बदलाव नहीं आता, तो तौबा महज़ मज़ाक़ बनकर रह जाती है।
जो लोग सच्ची तौबा करते हैं, अपने अमल को सुधारते हैं और पूरे इख़लास के साथ अल्लाह ही को अपना माबूद मानते हैं, ऐसे लोग दुनिया और आख़िरत — दोनों में सच्चे मोमिनों के साथ होंगे। यह बताता है कि नेक लोगों की सोहबत और उनका हिस्सा बनना सिर्फ़ एक सामाजिक बात नहीं, बल्कि यह अल्लाह की एक ख़ास रहमत और शरफ़ है। ऐसा इत्तेहाद (एकता) अल्लाह की तरफ़ से दी गई इनाम है, न कि केवल ज़ाहिरी साथ।
इस आयत का आख़िरी हिस्सा इस बात की ख़ुशख़बरी देता है कि सच्चे मोमिनों और तौबा करने वालों को अल्लाह बहुत जल्द बहुत बड़ा इनाम अता फ़रमाएगा। यह इनाम न हमारे आमाल के बराबर होगा और न हमारी सोच के मुताबिक़, बल्कि यह अल्लाह की रहमत और करम का असीम इज़हार होगा। इस आयत के ज़रिए अल्लाह हमें न सिर्फ़ तौबा की दावत दे रहा है, बल्कि यह यक़ीन भी दिला रहा है कि सच्चे दिल से लौट आने वालों को वह अपनी क़ुरबत और इनाम दोनों से नवाज़ेगा।
ऐ अल्लाह! हमें सच्ची तौबा की तौफ़ीक़ दे और हमें अपने नेक बंदों के साथ रख। आमीन।
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