कुरान - 4:146 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

146
إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُواْ وَأَصۡلَحُواْ وَٱعۡتَصَمُواْ بِٱللَّهِ وَأَخۡلَصُواْ دِينَهُمۡ لِلَّهِ فَأُوْلَـٰٓئِكَ مَعَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَۖ وَسَوۡفَ يُؤۡتِ ٱللَّهُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ أَجۡرًا عَظِيمٗا

Transliteration: (Illal lazeena taaboo wa aslahoo wa'tasamoo billaahi wa akhlasoo deenahum lillaahi faulaaa'ika ma'al mu'mineena wa sawfa yu'til laahul mu'mineena ajran 'azeemaa)

मगर जो लोग तौबा करें और अपने हालात दुरुस्त कर लें [426], और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लें और अपना दीन ख़ालिस तौर पर अल्लाह के लिए कर लें — तो ऐसे लोग मोमिनों के साथ होंगे [427]। और अल्लाह मोमिनों को जल्द ही बड़ा इनाम अता करेगा [428]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 146 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 146 की तफ़्सीर

 

✅ [426] तौबा वही क़ुबूल है जो दिल से हो

यह उन लोगों की बात है जो मुनाफ़िक़त या कुफ़्र से तौबा करते हैं और अपने आमाल को सही कर लेते हैं। इससे यह हिदायत मिलती है कि चाहे कोई कितना ही बड़ा गुनहगार क्यों न हो, अगर वह सच्चे दिल से तौबा करता है, तो अल्लाह उसकी तौबा क़ुबूल करता है। मगर तौबा सिर्फ़ ज़ुबान से अल्फ़ाज़ बोल देने का नाम नहीं, बल्कि असल तौबा वह होती है जिसमें इंसान अपने गुनाहों से पूरी तरह मुंह मोड़ ले और आज्ञाकारिता की राह अपनाए। अगर आमाल में बदलाव नहीं आता, तो तौबा महज़ मज़ाक़ बनकर रह जाती है।

✅ [427] सच्चे मोमिनों की सोहबत में होना अल्लाह की नेमत है

जो लोग सच्ची तौबा करते हैं, अपने अमल को सुधारते हैं और पूरे इख़लास के साथ अल्लाह ही को अपना माबूद मानते हैं, ऐसे लोग दुनिया और आख़िरत — दोनों में सच्चे मोमिनों के साथ होंगे। यह बताता है कि नेक लोगों की सोहबत और उनका हिस्सा बनना सिर्फ़ एक सामाजिक बात नहीं, बल्कि यह अल्लाह की एक ख़ास रहमत और शरफ़ है। ऐसा इत्तेहाद (एकता) अल्लाह की तरफ़ से दी गई इनाम है, न कि केवल ज़ाहिरी साथ।

✅ [428] अल्लाह का इनाम हर तसव्वुर से बढ़कर होगा

इस आयत का आख़िरी हिस्सा इस बात की ख़ुशख़बरी देता है कि सच्चे मोमिनों और तौबा करने वालों को अल्लाह बहुत जल्द बहुत बड़ा इनाम अता फ़रमाएगा। यह इनाम न हमारे आमाल के बराबर होगा और न हमारी सोच के मुताबिक़, बल्कि यह अल्लाह की रहमत और करम का असीम इज़हार होगा। इस आयत के ज़रिए अल्लाह हमें न सिर्फ़ तौबा की दावत दे रहा है, बल्कि यह यक़ीन भी दिला रहा है कि सच्चे दिल से लौट आने वालों को वह अपनी क़ुरबत और इनाम दोनों से नवाज़ेगा।

ऐ अल्लाह! हमें सच्ची तौबा की तौफ़ीक़ दे और हमें अपने नेक बंदों के साथ रख। आमीन।

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