कुरान - 4:147 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

147
مَّا يَفۡعَلُ ٱللَّهُ بِعَذَابِكُمۡ إِن شَكَرۡتُمۡ وَءَامَنتُمۡۚ وَكَانَ ٱللَّهُ شَاكِرًا عَلِيمٗا

Transliteration: (Maa yaf'alul laahu bi 'azaabikum in shakartum wa aamantum; wa kaanal laahu Shaakiran 'Aleema (End Juz 5))

अल्लाह को क्या ज़रूरत है कि वह तुम्हें सज़ा दे, अगर तुम शुक्रगुज़ार हो और ईमान लाओ। अल्लाह तो बड़ा क़द्र करने वाला, सब कुछ जानने वाला है [429]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 147 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 147 की तफ़्सीर

 

✅ [429] अल्लाह को सज़ा देने से कोई फ़ायदा नहीं

इस आयत में बताया गया है कि अल्लाह तआला को किसी को सज़ा देने से कोई निजी फ़ायदा नहीं होता। दुनिया के बादशाह कई बार तीन वजहों से सज़ा देते हैं — अपने नफ़े की हिफ़ाज़त के लिए, अपने ग़ुस्से की तसकीन के लिए, या दूसरों को सबक सिखाने के लिए। लेकिन अल्लाह इन सब कमज़ोरियों से पाक है। उसे किसी की इबादत या वफ़ादारी की ज़रूरत नहीं, और न ही वह किसी के इनकार से प्रभावित होता है।

अगर कोई बंदा ईमान लाता है और शुक्र करता है, तो अल्लाह को उसे सज़ा देने का कोई कारण नहीं होता। सज़ा सिर्फ़ उसी के लिए है जो कुफ़्र करता है और नेमतों का इनकार करता है। अल्लाह तआला तो शकूर है — यानी वह हर छोटे-बड़े नेक अमल को क़द्र देता है, और वह अलीम है — यानी हर इंसान के इरादों और आमाल को जानता है।

यह आयत हमें यह सोचने की दावत देती है कि अगर हम सच्चे दिल से ईमान लाएं और शुक्रगुज़ार बनें, तो हमारे लिए अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा खुला है और अज़ाब की कोई वजह बाक़ी नहीं रहती। क्योंकि अल्लाह की फ़ित्रत इनाम देने की है, न कि सज़ा देने की।

ऐ अल्लाह! हमें हमेशा तेरा शुक्रगुज़ार और सच्चा मोमिन बनाए रख। आमीन।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now