Transliteration: (Maa yaf'alul laahu bi 'azaabikum in shakartum wa aamantum; wa kaanal laahu Shaakiran 'Aleema (End Juz 5))
इस आयत में बताया गया है कि अल्लाह तआला को किसी को सज़ा देने से कोई निजी फ़ायदा नहीं होता। दुनिया के बादशाह कई बार तीन वजहों से सज़ा देते हैं — अपने नफ़े की हिफ़ाज़त के लिए, अपने ग़ुस्से की तसकीन के लिए, या दूसरों को सबक सिखाने के लिए। लेकिन अल्लाह इन सब कमज़ोरियों से पाक है। उसे किसी की इबादत या वफ़ादारी की ज़रूरत नहीं, और न ही वह किसी के इनकार से प्रभावित होता है।
अगर कोई बंदा ईमान लाता है और शुक्र करता है, तो अल्लाह को उसे सज़ा देने का कोई कारण नहीं होता। सज़ा सिर्फ़ उसी के लिए है जो कुफ़्र करता है और नेमतों का इनकार करता है। अल्लाह तआला तो शकूर है — यानी वह हर छोटे-बड़े नेक अमल को क़द्र देता है, और वह अलीम है — यानी हर इंसान के इरादों और आमाल को जानता है।
यह आयत हमें यह सोचने की दावत देती है कि अगर हम सच्चे दिल से ईमान लाएं और शुक्रगुज़ार बनें, तो हमारे लिए अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा खुला है और अज़ाब की कोई वजह बाक़ी नहीं रहती। क्योंकि अल्लाह की फ़ित्रत इनाम देने की है, न कि सज़ा देने की।
ऐ अल्लाह! हमें हमेशा तेरा शुक्रगुज़ार और सच्चा मोमिन बनाए रख। आमीन।
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