Transliteration: (Wa rafa'naa fawqahumut Toora bimeesaaqihim wa qulnaa lahumud khulul baaba sujjadanw wa qulnaa lahum laa ta'doo fis Sabti wa akhaznaa minhum meesaaqan ghaleezaa)
यहाँ "अहद" से मुराद बनी इसराईल से वह वादा है जो उन्होंने तौरात के अहकाम पर अमल करने के लिए किया था।
जब तौरात के तमाम सख़्त हुक्म एक साथ सामने आए,
तो वो हिचकिचाने लगे और कहने लगे: "हमने सुना तो है, लेकिन ये नहीं कर पाएँगे।"
इसलिए अल्लाह ने तूर पर्वत को उनके ऊपर उठा दिया,
और उन्हें सख़्त चेतावनी दी:
या तो अहद को मानो, या यह पहाड़ तुम पर गिरा दिया जाएगा।
यह दिखाता है कि शरीअत की बातों को अपनाना कितना ज़रूरी और ग़ैर-टालने योग्य था।
इसी से हमें यह भी समझ आता है कि क़ुरआन मुसलमानों पर धीरे-धीरे नाज़िल हुआ —
ताकि लोग आसानी से उसे समझें और अमल में ला सकें —
यह अल्लाह की रहमत का हिस्सा है।
यह दरवाज़ा अरिहा (Jericho) नामक शहर का था —
वह मुक़द्दस जगह जहाँ कई अंबिया अलैहिस्सलाम की क़ब्रें थीं।
इससे कई रूहानी सबक मिलते हैं:
मुक़द्दस जगहों में अदब और इंक्सारी (विनम्रता) के साथ दाख़िल होना चाहिए,
जिसका प्रतीक सज्दा है।
इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह जैसे बुज़ुर्गों का अमल इस पर गवाही देता है —
वो मदीना में कभी घोड़े पर सवार नहीं होते थे,
क्योंकि वहाँ रसूलुल्लाह ﷺ आराम फरमा रहे हैं।
कुछ लोग क़ुरआन या औलिया की क़ब्रों की तरफ़ पीठ नहीं करते,
क्योंकि वो इस आयत से अदब का फ़र्ज़ समझते हैं।
यह रवैया बताता है कि जो चीज़ें अल्लाह से जुड़ी हैं, उनके साथ आदर का सुलूक करना चाहिए।
"सब्त" उस दिन का नाम है जिसे बनी इसराईल को इबादत के लिए ख़ास करने का हुक्म मिला था।
इस दिन मछली पकड़ना और कारोबार करना मना किया गया था —
जैसे जुमा की नमाज़ के वक़्त मुसलमानों को दुनियावी काम से रोका जाता है।
बनी इसराईल ने इस हुक्म की खिलाफ़वर्जी की,
जो कि दूसरी आयतों में अल्लाह की सज़ा का बड़ा कारण बना।
यह हुक्म इस बात को उजागर करता है कि:
इबादत और मुक़द्दस वक़्तों से जुड़े हुक्मों की पाबंदी बहुत अहम है,
और इनकी नाफ़रमानी, सख़्त सज़ा का सबब बन सकती है।
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