Transliteration: (Fabimaa naqdihim meesaaqahum wa kufrihim bi Aayaatil laahi wa qatlihimul Ambiyaaa'a bighairi haqqinw wa qawlihim quloobunaa ghulf; bal taba'al laahu 'alaihaa bikufrihim falaa yu'minoona illaa qaleelaa)
"अल्लाह की निशानियाँ" यानी पैग़म्बरों के मोज़िज़े और हक़ की दलीलें।
इनका इनकार यह दर्शाता है कि इन लोगों का इंकार बहुत गहराई तक था।
किसी भी रसूल का इनकार, कुफ़्र की सबसे संगीन सूरत है,
क्योंकि रसूल सीधे अल्लाह की तरफ़ से भेजे जाते हैं और उनके साथ दलीलें व मदद होती है।
यहूद खुद भी मानते थे कि नबियों का क़त्ल नाजायज़ है —
क्योंकि नबी मासूम होते हैं और हक़ के साथ आते हैं।
फिर भी उन्होंने अल्लाह के रसूलों को बेगुनाही के बावजूद क़त्ल किया,
जो उनके तकब्बुर और रूहानी भ्रष्टता की हद को बयान करता है।
अल्लाह ने उनके दिलों पर मोहर लगा दी, लेकिन यह बिना वजह नहीं हुआ।
बल्कि यह उनकी लगातार बग़ावत और कुफ़्र का नतीजा था।
यह क़ुरआन का एक अहम उसूल है:
जब इंसान लगातार बुरे काम करता है और सच्चाई को ठुकराता है, तो अल्लाह उसकी रूहानी समझ छीन लेता है।
जैसा कि सूरा बक़रा (2:7) में भी कहा गया:
"अल्लाह ने उनके दिलों पर मोहर लगा दी है..."
इस तरह की मोहर का मतलब है कि:
अब हिदायत उनके दिलों में असर नहीं करती —
उनके दिल सच्चाई के लिए बेजान और बंद हो जाते हैं।
यहाँ जिस कुफ़्र का ज़िक्र है,
वह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के इनकार की तरफ़ इशारा करता है।
यह पहले वाले कुफ़्र की तकरार नहीं, बल्कि
एक अलग और बड़ा गुनाह है —
क्योंकि उन्होंने ईसा अलैहिस्सलाम की नबूवत को नकारा और झुठलाया।
इसलिए इस आयत में दिए गए हर जुमले में अलग-अलग वजहें हैं,
जिनकी वजह से अल्लाह की लानत उन पर आई।
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