कुरान - 4:165 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

165
رُّسُلٗا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةُۢ بَعۡدَ ٱلرُّسُلِۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمٗا

Transliteration: (Rusulam mubashshireena wa munzireena li'allaa yakoona linnaasi 'alal laahi hujjatum ba'dar Rusul; wa kaanallaahu 'Azeezan Hakeema)

रसूल इसलिए भेजे गए कि वे ख़ुशख़बरी दें और डराएँ, ताकि उनके आने के बाद लोगों के पास अल्लाह के मुक़ाबले में कोई हुज्जत (बहाना) बाक़ी न रहे [471]। और अल्लाह ग़ालिब और हिकमत वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 165 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 165 की तफ़्सीर

 

✅ [471] रसूलों को भेजने का उद्देश्य

नबियों और रसूलों को भेजने की सबसे बड़ी हिकमत यह है कि:

  • लोगों के पास अल्लाह के सामने कोई बहाना न रह जाए कि "अगर हमारे पास कोई नबी आता तो हम सही राह पर चल पड़ते।"
  • जब अल्लाह की तरफ़ से रसूल आ गया, तो अब हिदायत न मानने की कोई दलील क़बूल नहीं।

📖 यह बात कुरआन की दूसरी आयतों में भी ज़िक्र हुई है, जैसे सूरा बनी इसराईल (17:15):
"और हम (किसी क़ौम को) अज़ाब नहीं देते जब तक कोई रसूल न भेज दें।"

✅ दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष

  1. अज़ाब से पहले रसूल का आना ज़रूरी है
    • अल्लाह की अदल (इंसाफ़) का तक़ाज़ा यह है कि
      किसी क़ौम को तब तक सज़ा नहीं दी जाती जब तक उन्हें नबी के ज़रिए साफ़ हिदायत न मिल जाए।
    • हिदायत के बिना जवाबदेही नहीं होती, और जब पैग़ाम पहुंच जाए, तभी पूरी जिम्मेदारी शुरू होती है।
  2. रसूल — अल्लाह के हुक्मों की सच्ची जानकारी का एकमात्र स्रोत
    • अल्लाह और उसके हुक्मों की सच्ची समझ सिर्फ़ अक़्ल या दर्शन से हासिल नहीं हो सकती।
    • रसूल ही वह ज़रिया हैं जिनके ज़रिए अल्लाह का सच्चा पैग़ाम, ईमान, शरीअत और हिदायत मिलती है।
    • इंसानी अक़्ल सीमित है, वह सिर्फ़ वही (ईश्वरीय प्रकाशना) की रौशनी में ही अल्लाह की हक़ीक़त को जान सकती है।

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